ए राजा ने यूपीए सरकार के समक्ष एक बार फिर असहज स्थिति पैदा कर दी है, क्योंकि वह चाहते हैं कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) एक गवाह के रूप में उनका पक्ष भी सुने। निश्चय ही, 2जी स्पेक्ट्रम के विवादास्पद आवंटन में विभागीय मंत्री होने के नाते राजा की भूमिका सबसे अहम रही है, मगर क्या यह निर्णय उन्होंने अकेले लिया? क्या इतना बड़ा फैसला सरकार के सामूहिक उत्तरदायित्व के तहत नहीं आता है? नियमों को ताक पर रखकर और नीलामी प्रक्रिया को लचीला बनाकर किए गए उन आवंटनों के जरिये आखिर किन लोगों को फायदा पहुंचाने का मकसद था?
ये ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब तलाशे जाने की जरूरत है। राजा ने खुद को जेपीसी के समक्ष बुलाए जाने का आग्रह करते हुए लोकसभा अध्यक्ष को जो चिट्ठी भेजी है, उसका सार यह है कि उनका पक्ष ठीक से सुने बिना ही उन्हें दागी करार दिया गया है। किसी भी लोकतंत्र में आरोपी को भी अपना पक्ष रखने का हक है और इससे राजा को वंचित नहीं किया जाना चाहिए। मगर इसके बावजूद वह खुद 2जी स्पेक्ट्रम की बंदरबांट किए जाने के आरोप से बच नहीं जाते।
यह नहीं भूलना चाहिए कि राजा के शासनकाल में आवंटित 122 लाइसेंसों को देश की सर्वोच्च अदालत ने रद्द किया था। इसलिए यह और भी जरूरी है कि इस आवंटन से जुड़े सारे लोगों के नाम सामने आएं। चूंकि जेपीसी सर्वोच्च अदालत के फैसलों के आधार पर अपनी पूछताछ या निष्कर्षों को सीमित करने को बाध्य नहीं है, इसलिए राजा को तलब करने में कोई कानूनी अड़चन नहीं होनी चाहिए।
राजा ने जिन बातों का जिक्र किया है, उसमें से एक है जेपीसी के समक्ष अटार्नी जनरल जीई वाहनवती की गवाही, जिसमें उन्होंने पूर्व संचार मंत्री पर आवंटन से संबंधित प्रेस नोट को ऐन आखिर में बदलने का आरोप लगाया है। दरअसल इसी प्रेस नोट से पूरी प्रक्रिया उलट गई और मनचाहे ऑपरेटरों को लाइसेंस देने का रास्ता खुल गया था। 2जी स्पेक्ट्रम में पहले ही काफी फजीहत झेल चुकी यूपीए सरकार को राजा की गवाही से मुश्किल हो सकती है, क्योंकि इससे विपक्ष प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी चिदंबरम की गवाही के लिए भी दबाव बना सकता है।