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सांप्रदायिकता की राजनीति

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वोट बैंक की राजनीति किस तरह काम करती है, आंध्र प्रदेश के एक विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी का प्रसंग इसका ज्वलंत उदाहरण है, जिन्हें अब जाकर गिरफ्तार किया गया है। करीब एक पखवाड़ा पहले ओवैसी ने अपने भाषण में भारतीय राष्ट्र राज्य, इसकी प्रशासन-व्यवस्था, यहां तक कि इसकी न्याय प्रणाली को जिस तरह खुलेआम चुनौती दी थी, वह उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई की मांग करती थी।
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लेकिन इतने दिनों तक राज्य सरकार न सिर्फ सोई हुई रही, बल्कि गैरजमानती धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज करने के बावजूद पुलिस ओवैसी को बचने का रास्ता दे रही थी। समय-समय पर सोशल मीडिया से नाराजगी जताने वाली सरकारों को भी ख्याल नहीं आया कि ओवैसी का राष्ट्र-विरोधी भाषण यू-ट्यूब पर है। इस मामले में उतनी ही निंदनीय उन स्वघोषित सेक्यूलर पार्टियों व उनके नेताओं की चुप्पी भी है, जो सांप्रदायिक खतरे की आहट पाते ही मुखर हो उठते हैं।

ऐसे लोगों का यह रवैया एक बार फिर साबित करता है कि सांप्रदायिकता के खिलाफ उनका कथित अभियान न सिर्फ नकली है, बल्कि वे सिर्फ उन्हीं मामलों में आवाज उठाते हैं, जो उनकी राजनीति के अनुकूल बैठते हैं। ओवैसी का अपराध इसलिए भी अक्षम्य है, क्योंकि वह एक जनप्रतिनिधि हैं। ऐसे में दूसरी सजाओं के साथ विधानसभा की उनकी सदस्यता भी रद्द होनी चाहिए।
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अलबत्ता इस पूरे प्रसंग में राज्य की किरण रेड्डी सरकार का रवैया भी उतना ही क्षुब्ध करने वाला है। ओवैसी की पार्टी ने पिछले साल भले ही राज्य की कांग्रेस सरकार से समर्थन वापस ले लिया हो, पर वोट बैंक हाथ से निकल जाने के भय से वह उनसे तकरार के मूड में नहीं थी, क्योंकि जगनमोहन रेड्डी की चुनौती और तेलंगाना मुद्दा पहले ही उसकी कड़ी परीक्षा ले रहे हैं।

लेकिन इसी सुस्ती के कारण सरकार पहले जहां समाज के एक हिस्से के निशाने पर थी, वहीं विधायक की गिरफ्तारी से अब न सिर्फ उनके समर्थक सड़क पर उतर आए हैं, बल्कि पहले से ही सांप्रदायिक विद्वेष में झुलसते हैदराबाद में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की आशंका और तेज हो गई है। दूरदर्शिता बरतते हुए सरकार अगर तत्काल कार्रवाई करती, तो स्थिति ऐसी नहीं होती, जैसी कि आज है।   
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