पटना में नरेंद्र मोदी की हुंकार रैली में सिलसिलेवार बम विस्फोटों से हुई मौतें और घायलों की भारी संख्या दुर्भाग्यपूर्ण तो हैं ही, इससे यह भी स्पष्ट है कि भाजपा की इस बहुप्रचारित रैली के लिए सुरक्षा इंतजाम नाकाफी थे।
इस दुर्योग की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि भाजपा से रिश्ता टूटने के बाद यह दूसरा अवसर है, जब अमन-चैन बरकरार रखने के नीतीश कुमार के दावे की पोल खुली है। बिहार के मुख्यमंत्री का कहना है कि पिछले कुछ समय से राज्य के माहौल को अशांत करने की सुनियोजित कोशिश की जा रही है, ताकि उसका चुनावी लाभ उठाया जा सके! उनका आकलन अपनी जगह सही हो सकता है, लेकिन सरसरी तौर पर तो यह हादसा सुरक्षा तैयारी के मोर्चे पर विफलता का मामला ही ज्यादा है।
रैली में लोगों को लाने-ले जाने के लिए कई रेलगाड़ियां बुक कराई गई थीं। ऐसे में, पटना रेलवे स्टेशन पर भारी भीड़ उमड़ना स्वाभाविक था। लेकिन सुबह-सुबह रेलवे प्लेटफार्म के एक शौचालय में हुए विस्फोट ने सुरक्षा तैयारी में हुई चूक को साफ उजागर कर दिया। मानो यही काफी न हो, उसके बाद रैली स्थल के आसपास लगातार बम धमाके होते रहे। सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है कि बम धमाकों के बीच गांधी मैदान में अगर भगदड़ मचती, तो हादसा कितना भीषण हो सकता था।
बमों में टाइमर लगा होना, और रैली के बाद गांधी मैदान से कई जिंदा बमों की बरामदगी बताती है कि बड़े पैमाने पर हिंसा फैलाने की तैयारी थी। प्रशासन जहां इसे पहले से भांपने में विफल रहा, वहीं आयोजकों ने तामझाम पर तो पूरा ध्यान दिया, लेकिन रैली में आने वाले लोगों की सुरक्षा की चिंता उनके एजेंडे में नहीं थी।
एक लोकतंत्र में चुनावी रैलियों का आयोजन अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन ऐसे अवसरों पर सुरक्षा व्यवस्था में चूक की वजह से कोई हादसा होता है, तो उसका शिकार आम लोग ही होते हैं, जो न जाने कितनी मुश्किलों का सामना करते हुए रैली में पहुंचते हैं। मंच से बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेता तो तत्काल 'उड़' जाते हैं, वे घायलों का हालचाल पूछने की मानवीयता भी नहीं दिखाते। इस हादसे को न रोक पाने के लिए बिहार सरकार तो जिम्मेदार है ही, लेकिन रैली के आयोजक भी अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकते।