वैचारिक विविधता और असहमति लोकतंत्र की खूबसूरती है और संसद इन्हें व्यक्त करने का सबसे बड़ा मंच। लेकिन पिछले हफ्ते बाबा साहेब आंडेकर की सवा सौ वीं जयंती और संविधान दिवस तथा असहिष्णुता को लेकर संसद में हुई बहस के दौरान देश ने देखा कि राजनीतिक वर्ग असहमति और वैचारिक विविधता का सम्मान करने में किस तरह नाकाम रहा। असहमति का यह मतलब नहीं है कि दूसरे विचारों को पूरी तरह से खारिज ही कर दिया जाए। मगर इस पूरी बहस के दौरान यह तो देखा गया कि भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपनी तय लाइन पर तो बात की, लेकिन इसमें सहमति तो छोड़ें दूसरे विचारों के प्रति सम्मान की भी कोई गुंजाइश नहीं दिखी। अंततः यह बहस बहुत सामान्य किस्म की ही साबित हुई, जिसमें कोई नए तर्क या लीक तोड़ती हुई लाइन नहीं दिखी।
तो क्या राजनीतिक वर्ग ने देश के लोगों को संदेश देने का मौका गंवा दिया? यदि विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के भाषणों पर गौर करें तो ऐसा ही लगता है। जब भी असहिष्णुता और सांप्रदायिक हिंसा की बात आती है तो कांग्रेस, भाजपा और वाम दलों के पास वही तर्क होते हैं। यदि कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के पास भाजपा के खिलाफ 2002 के गुजरात के दंगे और संघ परिवार के नेताओं के अल्पसंख्यक तबके खासतौर से मुसलमानों के खिलाफ दिए जाने वाले बयान सबसे बड़ा हथियार हैं, तो भाजपा आपातकाल, सिख विरोधी दंगों को कांग्रेस के खिलाफ हथियार बनाती है।
हर मुद्दे पर राजनीतिक दलों में सहमति बन जाए यह कहना तो भोलापन होगा। लेकिन ऐसा क्यों नहीं हो सका कि संसद से कोई ऐसा संदेश जाता जिससे लोगों का भरोसा राजनीतिक वर्ग पर बढ़ता। ऐसा क्यों नहीं हो सका? इसकी वजह यह है कि हमारे राजनीतिक वर्ग में अपराध बोध की कमी है।
क्या कांग्रेस को आपातकाल और 1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए जिनमें तीन हजार से अधिक निर्दोष लोगों को जलाकर मार डाला गया, अपराध बोध नहीं होना चाहिए? क्या सर्वाधिक समय तक सत्ता में रहने के बावजूद गरीबी न हटा सकने, की वजह से कांग्रेस के नेताओं में अपराध बोध नहीं होना चाहिए? क्या नंबूदरीपाद के नेतृत्व में पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार को गैरलोकतांत्रिक तरीके से बर्खास्त करने की वजह से उसमें अपराधबोध नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसके बाद केंद्र को विरोधी दलों की राज्य सरकारों को बर्खास्त करने का रास्ता मिल गया?
क्या भाजपा के नेताओं में छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस करने के लिए अपराध बोध नहीं होना चाहिए, जिसकी वजह से देश में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई? क्या भाजपा को 2002 के गुजरात दंगों के कारण अपराधबोध नहीं होना चाहिए, जब दंगाइयों की भीड़ निर्दोष मुसलमानों को निशाना बना रही थी, क्योंकि तब राज्य में उसकी सरकार थी? क्या केंद्र में सत्तारूढ़ इस पार्टी को अपने ही देश के नागरिकों को पाकिस्तान भेज देने जैसे अपने नेताओं के बय़ानों के लिए अपराधबोध नहीं होना चाहिए? क्या इस पार्टी को छत्तीसगढ़ में जहां वह डेढ़ दशक से सत्ता में है, सलवा जुडूम के लिए अपराधबोध नहीं होना चाहिए, जोकि आदिवासियों के लिए दुस्वप्न बन गया था?
क्या कम्युनिस्ट पार्टियों को अपराधबोध नहीं होना चाहिए कि पैंतीस वर्ष तक पश्चिम बंगाल की सत्ता में रहने के बावजूद वह इस राज्य को विकास की मुख्यधारा से नहीं जोड़ सके? क्या इन पार्टियों को उनके शासन के दौरान हुई तमाम राजनीतिक हत्याओं के कारण अपराधबोध नहीं होना चाहिए?
क्या देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के नेताओं को मुजफ्फरनगर और दादरी की घटनाओं के लिए अपराधबोध नहीं होना चाहिए? क्या उनमें इस प्रदेश को विकास के पैमाने पर हाशिये पर रखने के लिए अपराधबोध नहीं होना चाहिए?
क्या अपेक्षाकृत शांत समझे जाने वाले ओडिशा में डेढ़ दशक से भी अधिक समय तक सत्ता पर काबिज बीजू जनतादल के नेताओं को आदिवासियों की बदहाली दूर न कर सकने के लिए अपराधबोध नहीं होना चाहिए?
क्या शिवसेना के भीतर संविधान की मूल भावनाओं को न समझ पाने के कारण और मुंबई को अपनी जागीर समझने की भूल करने की वजह से अपराधबोध नहीं होना चाहिए?
यह सूची बहुत लंबी हो सकती है।
मसलन, किसानों की आत्महत्या, श्रमिकों की बदहाली और विकास के नाम पर आदिवासियों के विस्थापन, के लिए समूचे राजनीतिक वर्ग के भीतर किसी तरह का अपराधबोध नहीं होना चाहिए?
अपराधबोध होना मनुष्य होने की शर्त है और इसका न होना सबसे बड़ी असहिष्णुता।