यह क्या संयोग है कि जब दिवाली अपने धार्मिक अनुष्ठान से बाहर निकलकर खासकर शहरी भारत में लेन-देन और दिखावे के एक अचूक अवसर में बदल गई है, तब होली की तरह का विशुद्ध लोकोत्सव हमारे ग्रामीण समाज में भी आखिरी सांसें गिन रहा है!
होली किसी भी सभ्यता के लिए प्राणवायु जैसी है-दुर्गुणों की होलिका जलाकर, प्रकृति से रंग लेकर, आनंद-उल्लास की दुनिया में डूबने-उतराने की बात हमारे यहां ही सोची जा सकती थी।
वसंत में प्रकृति का उल्लास चैत में फसलों की कटाई तक आते-आते मनुष्य के आदिम उत्साह में बदल जाता था। पलाश के फूल उस आनंद में रंग भरते थे, तो देर रात तक बजते ढोल उस उल्लास को स्वर देते थे।
आनंद के उस निष्कपट अवसर की इतनी महत्ता थी कि शत्रुओं के भी दरवाजे पर जाकर उन्हें गले लगाया जाता था। रंग डालना तो उस आनंद को व्यक्त करने का एक तरीका भर था, जो अपनी व्यापकता में भीतर के कलुष को दूर करने का प्रतीक बनता था।
प्रकृति की विराटता और सुंदरता के बीच तब दुनियावी जरूरतें छोटी होती थीं और होली की सामूहिकता को नष्ट नहीं होने देती थीं। सामूहिक उल्लास के उन्हीं क्षणों में होली गाने की परंपरा शुरू हुई होगी। आज पलाश इतने कम रह गए हैं कि चाहकर भी उससे होली का रंग नहीं बनाया जा सकता।
जो आदमी कभी वसंत से चैत तक प्रकृति के परिवर्तन पर बच्चों की तरह खुश होता था, आज उसे अपनी आजीविका की चिंता है। लिहाजा पहले की तरह होली उसके जीवन में रंग नहीं भर पाती। जो मशीनी जीवन हमने चुना है, उसमें होली जैसे लोकोत्सव की जगह हाशिये पर ही हो सकती है।
यह अचानक नहीं है कि विराट मध्यवर्ग वाले जिस देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा एक से एक त्योहार ईजाद किए जा रहे हैं, वहां होली पहले की तुलना में उपेक्षित ही अधिक हुई है।
इसीलिए होली आती है, और रंग खेलने के कुछ हिंसक तरीकों, मनोरंजन के कुछ अश्लील गीतों और जहरीली शराब से होने वाली कुछ मौतों की सूचना के साथ विदा हो जाती है।
जब ग्रामीण जीवन अपना अस्तित्व बचाने की कठिन लड़ाई लड़ रहा है और शहरी भारत अपनी आत्मकेंद्रित व्यस्तता में डूबा है, तब जीवन में रंग भरने की चिंता भी कौन करे!