हाल के दौर में पूर्व नौकरशाहों और बेहद नजदीक रहे लोगों ने मनमोहन सिंह को निशाना बनाते हुए किताबों की जिस तरह झड़ी लगा दी है, उसमें अब यह गणना भी मायने नहीं रखती कि ट्राई के पूर्व चेयरमैन प्रदीप बैजल की ताजा पुस्तक इस संदर्भ में तीसरी है या चौथी। पर ऐसी हर किताब पूर्व प्रधानमंत्री की नैतिक आभा थोड़ी कम जरूर कर देती है।
बैजल का आरोप अतिरंजनापूर्ण हो सकता है कि 2जी मामले में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री दयानिधि मारन का साथ न देने की स्थिति में मनमोहन सिंह ने उन्हें परिणाम भुगतने की धमकी दी थी। यही नहीं, संजय बारु और पी सी परख की तरह प्रदीप बैजल से भी यह सवाल किया जा सकता है कि पूर्व प्रधानमंत्री से जुड़ी ये सच्चाई उसी समय जाहिर करने का साहस दिखाने के बजाय किताब लिखने तक इंतजार क्यों किया। क्या इसलिए कि सत्ता से बाहर होने के बाद लिखना आसान होता है, और प्रचार के साथ-साथ सत्ताधारी पार्टी के समर्थन का राजनीतिक लाभ भी मिल जाता है?
विनिवेश के पुराने मामले में सीबीआई ने बैजल पर पिछले साल जो मुकदमा दर्ज किया है, उसके आलोक में यह बचाव का उनका पैंतरा हो, तो क्या आश्चर्य! लेकिन सवाल यह है कि 2जी घोटाले के परिप्रेक्ष्य में क्या मनमोहन सिंह का बचाव किया जा सकता है। यूपीए सरकार का मुखिया होने के कारण मनमोहन सिंह पर घोटालों को रोकने की जिम्मेदारी थी।
लेकिन चाहे गठबंधन धर्म निभाने की मजबूरी रही हो या पार्टी अध्यक्ष का निर्देश, 2जी मामले में उन्होंने तत्कालीन दूरसंचार मंत्री दयानिधि मारन को अपनी मर्जी से काम करने दिया, और बाद में जब यह घोटाला सामने आया, तो उन्होंने खुद को इससे दूर कर लिया। बैजल के आरोपों पर असहज पूर्व प्रधानमंत्री ने जो सफाई दी है, वह भी लचर है। उनका कहना है कि उन्होंने अपने या अपने परिवार के लिए कभी कोई भ्रष्टाचार नहीं किया। लेकिन उन पर यह आरोप तो कोई लगा भी नहीं रहा।
उन पर आरोप यह है कि 2जी घोटाले के बारे में अवगत होने के बावजूद उसे रोकने के लिए उन्होंने समय रहते कुछ नहीं किया। कायदे से उन्हें इसका जवाब देना चाहिए। एक के बाद एक भ्रष्टाचार की कीमत कांग्रेस अपनी सत्ता गंवाकर दे चुकी है। इन भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी लेने से दूर भागकर मनमोहन सिंह अपनी 'छवि' का नुकसान ही कर रहे हैं।