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नई पारी की चुनौतियां

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नरेंद्र मोदी ने चौथी बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने के साथ ही जता दिया है कि वह राष्ट्रीय राजनीति में उतरने के लिए तैयार हैं। शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा के तमाम दिग्गजों के साथ ही जयललिता, प्रकाश सिंह बादल, ओम प्रकाश चौटाला, उद्धव और राज ठाकरे जैसे नेताओं की मौजूदगी ने इसकी पुष्टि ही की है।
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नीतीश कुमार, नवीन पटनायक और ममता बनर्जी की अनुपस्थिति के राजनीतिक अर्थों को समझने में चूक किए बगैर मोदी की बढ़ती स्वीकार्यता को कमतर नहीं आंका जा सकता। दरअसल मोदी की सबसे बड़ी चुनौती तो खुद मोदी ही हैं। वर्ष 2001 में आए भीषण भूकंप के कुछ महीने बाद केशुभाई पटेल से छीनकर मोदी को राज्य की कमान सौंपी गई थी। इसलिए बीते करीब 11 वर्षों में गुजरात आज जहां खड़ा है, उसका श्रेय मोदी को जाता है। उनके हिस्से में अपयश और यश, दोनों आए।

लाख टके का सवाल है कि क्या गुजरात ने विकास और सामाजिक समरसता का ऐसा मॉडल तैयार कर लिया है, जिसके सहारे मोदी दिल्ली का रास्ता तय कर सकते हैं? बेशक, वह तीसरी बार चुनाव जीतकर आए हैं, मगर शहरी और ग्रामीण गुजरात के बीच की खाई अभी कम नहीं हुई है। बीते दस वर्षों में गुजरात की औसत विकास दर महज 6.1 फीसदी ही रही है और यह हरियाणा से कम है।
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तीन वर्ष तक के 47 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं और सौराष्ट्र में केशुभाई के असर को नकारने और 35 सीटें जीतने के बावजूद उन्हें यह देखना होगा कि वहां पानी की समस्या विकराल है। इन आंकड़ों के साथ मोदी भी राष्ट्रीय राजनीति में नहीं उतरना चाहेंगे! मगर मोदी और उनकी पार्टी के पास 2014 के आम चुनाव से पहले अवसर है कि वे इसे दुरुस्त कर लें।

यही अवसर छठी बार हिमाचल प्रदेश की कमान संभालने वाले वीरभद्र सिंह और उनकी पार्टी कांग्रेस के पास है, जिसकी साख लगातार गिरती जा रही है। यह पहाड़ी राज्य आकार में छोटा जरूर है, लेकिन वहां प्रशासन की विसंगतियां भी कम नहीं हैं, जिन्हें दूर कर विकास की राह पकड़ी जा सकती है। बेशक गुजरात और हिमाचल की तुलना नहीं की जा सकती, मगर इनके नतीजे भाजपा और कांग्रेस, दोनों को ढेरों सबक दे गए हैं।
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