शनिवार को नेपाल में आए भीषण भूकंप से हुए नुकसान के आकलन में काफी वक्त लगेगा, लेकिन वहां युद्ध स्तर पर राहत और बचाव कार्य की जरूरत है। पश्चिमी नेपाल के दूरस्थ पहाड़ी इलाकों में तो अब तक बचाव दल नहीं पहुंच सके हैं, जिससे आशंका है कि मृतकों की संख्या और बढ़ सकती है।
असल में भूकंप के बाद बारिश ने भी मुश्किलें बढ़ाई हैं, जिससे बचाव कार्य में कठिनाइयां आ रही हैं। हालांकि इस आपदा के तुरंत बाद भारत सरकार ने जो तत्परता दिखाई, उससे लगभग सड़क पर आ गई वहां की सरकार को बल मिला होगा। मगर जिस तरह से पूरा देश ही अस्त-व्यस्त हो गया है, उससे वहां की चुनौती को समझा जा सकता है। ऐसी आपदा के बाद सबसे बड़ी मुश्किल लोगों तक पानी, खाद्य सामग्री और चिकित्सकीय मदद पहुंचाने की होती है। वहां अब भी हजारों लोग अपने घरों से बाहर खुले मैदान और टेंट वगैरह में रहने को मजबूर हैं।
महज 2.7 करोड़ की आबादी वाले इस छोटे से देश में यह भूकंप सचमुच पहाड़ जैसी आपदा लेकर आया है। एक दशक की माओवादी हिंसा से जूझने के बाद वर्ष 2006 में वहां लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना का रास्ता जरूर खुला था। मगर पिछले करीब नौ वर्षों से यह देश राजनीतिक अस्थिरता से ही गुजर रहा है। इसका असर वहां की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। हालत यह है कि नेपाल की करीब एक चौथाई आबादी भारत और खाड़ी के देशों में छोटा-मोटा काम धंधा करने को मजबूर है।
ऐसे में इस आपदा ने नेपाल की मानो रीढ़ ही तोड़कर रख दी है। वहां के प्राचीन मंदिरों, ऐतिहासिक इमारतों और मकानों को भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे उबरने में उसे काफी वक्त लगेगा। इसके अलावा राजधानी काठमांडू सहित अनेक शहरों की आधारभूत संरचना पूरी तरह से चरमरा गई है। वास्तव में नेपाल के ग्रामीण इलाकों में हुए नुकसान के बारे में तो अभी ठीक से पता तक नहीं है।
जाहिर है, नेपाल को जल्द ही पुनर्निर्माण के लिए भी जुटना होगा और तब उसे और बड़ी मदद की जरूरत होगी। जरूरी यह भी है कि हम बेतरतीब और अंधाधुंध विकास के फेर में पड़ना छोड़कर समय रहते चेत जाएं। दो वर्ष पूर्व उत्तराखंड में आई तबाही की तरह यह भूकंप भी इसी बात का उदाहरण है कि हम प्रकृति के संकेतों को ठीक से समझ नहीं रहे हैं।