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संदेह की सीबीआई

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यह हास्यास्पद भी है और अविश्वसनीय भी कि द्रमुक द्वारा समर्थन वापसी के छत्तीस घंटे बाद उसके कार्यकारी अध्यक्ष स्टालिन और उनके बड़े भाई अलागिरी के चेन्नई स्थित घरों पर सीबीआई का छापा पड़ता है, और दिल्ली में हड़बड़ाई सरकार इसमें अपना हाथ होने से इनकार करती है।
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यही नहीं, उसके मंत्री भी अलग-अलग जुबान बोलते हैं। प्रधानमंत्री मामले की जांच का भरोसा देते हैं, वित्त मंत्री छापे की निंदा करते हैं, कार्मिक और प्रशिक्षण मंत्री सीबीआई की स्वायत्तता का राग अलापते हैं, और दूरसंचार मंत्री इसके पीछे सरकार की छवि बिगाड़ने की सुनियोजित साजिश से इनकार नहीं करते। विरोधियों पर दबाव डालने के लिए केंद्र सरकार सीबीआई का इस्तेमाल करती ही रही है।

केंद्र से छत्तीस का आंकड़ा रखने पर हमने मुलायम सिंह और मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में सीबीआई छापे देखे हैं, तो उसका साथ देने पर लालू यादव के प्रति सीबीआई को नरमी बरतते भी पाया है। इसलिए सरकार की यह सफाई आश्वस्त नहीं करती कि उसे कुछ पता नहीं।
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दूसरी तरफ, सीबीआई अगर सचमुच स्वायत्त है, और स्टालिन व अलागिरी के घर पर पड़े छापे प्रक्रिया के तहत थे, तो केंद्रीय मंत्रिगण इस शीर्ष जांच एजेंसी पर दबाव कैसे बना सकते थे, और उनकी नाराजगी के बाद सीबीआई अधिकारी छापे की कार्रवाई अधूरी छोड़कर चले क्यों गए? फिर छापे में उस राजस्व अन्वेषण निदेशालय यानी डीआरआई के अधिकारी भी थे, जो वित्त मंत्रालय के अधीन आता है।

इसके बाद भी अगर चिदंबरम को छापे के बारे में पता नहीं था, तो यह केंद्र सरकार की काहिली के बारे में ही बताता है। यह मुद्दा गंभीर इसलिए भी है कि सीबीआई और डीआरआई का संयुक्त अभियान तमिलनाडु में सीमा शुल्क की चोरी कर विदेशों से लाई गई तैंतीस बड़ी कारों की बिक्री का था, जिससे राजकोष को करोड़ों का नुकसान हुआ है। चोरी की इन कारों में से एक स्टालिन के बेटे की भी बताई जाती है।

क्या सीबीआई छापे की भनक ही स्टालिन को यूपीए से रिश्ता तोड़ने की हद तक ले गई? जब चोरी की दूसरी कारें बरामद कर ली गई हैं, तो स्टालिन के बेटे पर मेहरबानी क्यों? वैसे भी केंद्र को समर्थन देने की द्रमुक ने भारी कीमत वसूली है। संदेह यह है कि द्रमुक द्वारा रिश्ता तोड़ लेने के बाद भी केंद्र सरकार मौजूदा मामले में उसे बचा रही है। ऐसे में लाजिमी है कि वह स्टालिन के घर पर पड़े सीबीआई छापे का पूरा सच बताए।
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