इससे पहले कि कश्मीर में कट्टरपंथियों के दबावों से सहमी तीन मासूम लड़कियां रॉक बैंड से सचमुच तौबा कर लें, उमर सरकार को सख्त कदम उठाना ही होगा। बेशक उनका यह रॉक बैंड शौकिया ही ज्यादा लगता है, लेकिन कट्टरपंथ और आतंकवाद से ग्रस्त एक राज्य में स्त्री मुक्ति के इस प्रतीक को ध्वस्त नहीं होने देना चाहिए। उनके बैंड का जो नाम है, वह अंधेरे से रोशनी की ओर ले जाने की प्रेरणा देता है।
फिर उन्होंने किसी मजहब को अपमानित करने की कोशिश भी नहीं की। बल्कि स्कूलों में पढ़ने वाली इन लड़कियों को तो मजहब और उसकी राजनीति करने वालों के बारे में भी ज्यादा कुछ मालूम नहीं। कट्टरपंथियों के रवैये पर हालांकि बहुत हैरानी नहीं है; उन्हें ऐसी हर चीजों से नफरत है, जो मानवीयता, प्रेम और विश्व बंधुत्व का प्रसार करती हैं।
संगीत को गैरइस्लामी बताने वालों इन लोगों को यह ज्ञान तो नहीं ही है कि खासकर इस उपमहाद्वीप में संगीत की परंपरा दिग्गज मुस्लिम गायकों-संगीतकारों की वजह से ही इतनी समृद्ध है, वे यह भी भूल रहे हैं कि शताब्दियों पहले इसी कश्मीर में लाल देड और हव्वा खातून जैसी शख्सियतों ने गायिकी को अद्भुत पहचान दी थी। विद्रूप देखिए कि वे आधुनिक विश्व के बारे में भी नहीं जानते कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के अलावा तालिबान की पाबंदियों से ग्रस्त अफगानिस्तान में भी लड़कियों का रॉक बैंड है!
कश्मीर में इस तरह के फतवों को बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि पिछले कुछ समय से यहां स्थिति सामान्य होती दिखाई दे रही थी। सिर्फ यही नहीं कि आतंकवादी घटनाओं में कमी आई है, उससे भी महत्वपूर्ण यह कि राज्य के आम लोग विकास की मुख्यधारा में लौटते दिखाई पड़े हैं।
कट्टरपंथी और सीमापार से आतंकवाद को खाद-पानी देने वाले बदले घटनाक्रम से चिंतित हैं, इसीलिए वे सरपंचों को धमकियां देकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अवरुद्ध करना चाहते हैं, तो कलाओं पर फतवा जारी कर अमन-चैन का माहौल बिगाड़ना चाहते हैं।
यह सच है कि पिछले कई अवसरों पर राज्य सरकार उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है, लेकिन इस बार उसे फतवों के खिलाफ सख्त होना ही चाहिए, क्योंकि प्रतिरोध की तमाम आवाजों पर मुफ्ती का दबाव भारी पड़ता दिख रहा है।