दिन की मान-मनौव्वल के बाद भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी जहां से चाहें, लोकसभा का चुनाव लड़ सकते हैं। आडवाणी ने भी आखिरकार गांधीनगर से ही चुनाव लड़ने की हामी भर दी है। मगर बात सिर्फ लोकसभा चुनाव के एक टिकट की नहीं है, नरेंद्र मोदी के उभार के बाद से आडवाणी पार्टी के भीतर खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं।
ऐसा लगता है कि 86 वर्ष के हो चुके आडवाणी पार्टी में हो रहे बदलाव को सहजता से नहीं ले पा रहे हैं। राजनीति असीम संभावनाओं का खेल है, और खुद आडवाणी ने छह दशक लंबे राजनीतिक जीवन में बहुत से उतार-चढ़ाव देखे हैं, शायद इसीलिए वह खुद को बदले माहौल में भी प्रासंगिक बनाए रखना चाहते हैं।
गांधीनगर के बजाय भोपाल से चुनाव लड़ने की मंशा जताकर उन्होंने एक बड़ा दांव चला था, क्योंकि वह किसी भी रूप में यह नहीं जतलाना चाहते कि वह मोदी की कृपा पर निर्भर हैं। लेकिन उनकी सीट को लेकर हुए विवाद से साफ है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है।
भूलना नहीं चाहिए कि चार महीने पहले विधानसभा चुनावों के समय आडवाणी ने मध्य प्रदेश और गुजरात के विकास मॉडलों की तुलना तक कर डाली थी, जिसे शिवराज सिंह चौहान और मोदी की तुलना करने की तरह ही देखा गया था।
इसमें दो राय नहीं कि 1980-90 के दशक में भाजपा को उन्होंने शिखर पर पहुंचाया, मगर वह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि पार्टी में अब उनका समय बीत चुका है और अब उनकी भूमिका सिर्फ मार्गदर्शक की ही हो सकती है।
भाजपा यदि आगामी लोकसभा चुनाव में अपने लिए संभावनाएं देख रही है, तो इसकी वजह नरेंद्र मोदी हैं, जिन्हें पार्टी के आम कार्यकर्ताओं के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन भी हासिल है और नए दलों के बीच उनकी स्वीकार्यता भी बढ़ रही है। संघ और भाजपा के रिश्तों और उनकी रणनीतियों को आडवाणी से बेहतर भला कौन जान सकता है, पर ऐसा लगता है कि वह धारा के विपरीत चलना चाहते हैं।
मगर क्या आडवाणी को यह नहीं देखना चाहिए कि अपने राजनीतिक करियर के आखिरी पड़ाव में वह पार्टी के भीतर अलग-थलग क्यों पड़ते जा रहे हैं?