कोयला खदानों के आवंटन के बारे में अटॉर्नी जनरल जी ई वाहनवती ने सर्वोच्च अदालत के समक्ष स्वीकार किया है कि इसकी प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है, जिसमें पारदर्शिता बरती जा सकती थी। मगर इसके बचाव में उन्होंने जो तर्क दिया है, वह गले नहीं उतरता।
उनका कहना है कि 90 के दशक की शुरुआत में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के साथ देश में बिजली और लोहे की मांग बढ़ी, जिसकी वजह से ऐसे संयंत्रों के लिए कोयले की जरूरत थी, इसलिए नीलामी के बजाय 'पहले आओ पहले पाओ' की नीति पर अमल किया गया। मगर 2 जी स्पेक्ट्रम के मामले में भी इसी नीति पर चला गया था, जिसमें आखिरकार सर्वोच्च अदालत को 122 लाइसेंस रद्द करने पड़े थे। दरअसल मामला नीति के साथ नीयत का भी है, जिसमें खोट नजर आ रही है।
यूपीए सरकार लगातार देश की इन दोनों प्राकृतिक संपदा के आवंटन में किसी भी तरह की गड़बड़ी से इन्कार करती रही है और उसके कई मंत्री नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) के आकलन को खारिज करते रहे हैं, जिसने इन दोनों के आवंटन में क्रमशः 1.86 लाख करोड़ और 1.76 लाख करोड़ रुपये के अनुमानित नुकसान का अनुमान लगाया था। मगर अब सरकार की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि जिन कंपनियों को कोयला खदानें आवंटित की गई हैं, उन्होंने चूंकि लाखों करोड़ का निवेश कर लिया है, इसलिए उन्हें रद्द न किया जाए!
सवाल है कि सरकार आखिर किसके हित में काम कर रही है, और किन्हें बचाना चाहती है। यदि यह मामला सर्वोच्च अदालत में नहीं आता, तो यह पता ही नहीं चलता कि इन कंपनियों ने वन और पर्यावरण सहित अनेक तरह की मंजूरी और लाइसेंस लिए बिना खदानों में काम भी शुरू कर दिया है। वहीं जंगल से कोई आदिवासी वनोपज उठा ले तो उसे कानून की न जाने कितनी धाराएं बता दी जाती हैं। इन कंपनियों को सरकार की ओर से सिर्फ आशय पत्र मिले हैं, मगर इसका मतलब यह नहीं कि वे नियमों को ताक पर रख दें।
इस मामले में संबंधित राज्यों की ओर से जो तर्क दिए गए हैं, उससे तो यह भी लगता है कि केंद्र सरकार ने न केवल उन्हें भरोसे में नहीं लिया, बल्कि उनसे प्रक्रियागत जानकारियां भी छिपाईं। और क्या यह भी सच नहीं है कि इसी सरकार ने जयंती नटराजन को वन और पर्यावरण मंत्री के पद से हटने को मजबूर कर दिया, क्योंकि वह कई बड़ी परियोजनाओं की राह में रोड़ा बन रही थीं?