पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में चुनाव से पहले सत्ता और विपक्ष के बीच तकरार से जो हिंसक स्थिति पैदा हुई है, वह बेशक वहां का अंदरूनी मामला है, लेकिन यह भारत जैसे देशों के लिए भी समान रूप से चिंतनीय होना चाहिए। दरअसल शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार ने करीब दो साल पहले चुनाव से पूर्व कार्यवाहक सरकार गठित करने के प्रावधान को संविधान संशोधन के जरिये बेअसर कर दिया था।
इसके बावजूद विपक्ष एक कार्यवाहक सरकार की देखरेख में चुनाव कराने की मांग पर न सिर्फ अड़ा हुआ है, बल्कि विगत दो सप्ताहों में दो बार उसने हड़ताल बुलाई। इस दौरान जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा, अर्थव्यवस्था को भारी क्षति पहुंची और गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक तीन सौ से भी अधिक लोग मारे गए। बांग्लादेश को हिंसा की इस राह पर ले जाने के लिए, जाहिर है, वहां का कट्टरवादी विपक्ष ही जिम्मेदार है।
अब दो घटनाक्रम ऐसे हुए हैं, जिससे विपक्ष सरकार के खिलाफ अपना हमला और तेज करेगा। एक तो सरकार ने बेगम खालिदा जिया के उस भगोड़े बेटे के प्रत्यर्पण की इंग्लैंड से मांग की है, जो भ्रष्टाचार सहित दूसरे कई गंभीर मामलों में वांछित हैं। विपक्षी दल इसे सत्ता पक्ष की दबावी राजनीति बता ही रहा है। मानो यही काफी न हो, अब चुनाव आयोग ने उच्च न्यायालय के एक फैसले के परिप्रेक्ष्य में जमात को अगला चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया है।
दरअसल विगत अगस्त में ही उच्च न्यायालय ने एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर जमात के रजिस्ट्रेशन को गैरकानूनी ठहरा दिया था। जमात के सामने अब सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने के सिवा कोई विकल्प नहीं है, लेकिन मानना मुश्किल है कि शीर्ष अदालत उसे कोई राहत देगी। मुक्तियुद्ध के दौरान पाकिस्तान के मददगारों को कठोर सजा दिलवाने के कारण शेख हसीना की सरकार पहले से ही जमात के निशाने पर है। अब उसके चुनाव लड़ने का रास्ता बंद हो जाता है, तो कट्टरवादी नए सिरे से हिंसा और तोड़फोड़ पर उतर सकते हैं।
बांग्लादेश में चुनाव पूर्व हिंसा का इतिहास पुराना है, लेकिन हाल के वर्षों में वहां कट्टरवादियों ने जिस तरह सिर उठाया है, उसमें नए घटनाक्रमों से आशंकाएं ही पैदा होती हैं।