फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सुरक्षा और आजादी के बीच

Tue, 11 Jun 2013 08:55 PM IST
नई दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन
अमेरिका की ताकतवर नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी (एनएसए) के अति गोपनीय निगरानी कार्यक्रम के बारे में इसी एजेंसी के एक पूर्व कर्मचारी एडवर्ड स्नोडेन के सनसनीखेज खुलासों से पता चलता है कि किस तरह महाशक्ति देश न केवल अपने लोगों की; बल्कि भारत सहित दुनिया के तमाम देशों की निगरानी कर रहा है।
विज्ञापन


9/11 के आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने अपने सुरक्षा और खुफिया तंत्र को पुख्ता बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन सुरक्षा की आड़ में जिस तरह से लोगों की निजी जिंदगी में दखल देकर जानकारियां जुटाई जा रही हैं, उसने नागरिक आजादी को लेकर एक नई बहस ही छेड़ दी है।

एनएसए और सीआईए ने प्रिज्म नामक जो कार्यक्रम बनाया है, उसमें किसी भी नागरिक के ई-मेल, टेलीफोन संवाद से लेकर क्रेडिट कार्ड और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर डाली गई जानकारियां तक जुटाई जा सकती हैं, जिसे निजता में दखल माना जा रहा है।
विज्ञापन


अमेरिका दूसरे देशों की निगरानी करता रहा है, यह कोई छिपी बात नहीं है और फिर विकिलीक्स के खुलासों से भी ये बातें सामने आ ही चुकी हैं। मगर वह जानकारियां सिर्फ सरकारों और सरकारी संस्थाओं के स्तर तक ही सीमित रही हैं।

इसमें दो राय नहीं हो सकती कि किसी देश की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए, मगर नागरिक आजादी के बिना किसी भी तरह की सुरक्षा का क्या मतलब है? यह ठीक है कि साइबर जानकारियों के जरिये आतंकवादियों को पकड़ने में मदद मिली है, जैसा कि मुंबई हमले में संलिप्त रहे डेविड हेडली के बारे में बताया जा रहा है।

मगर इस तरह की निगरानी से आम नागरिकों की निजता का हनन तो नहीं होना चाहिए। इधर अपने देश में भी नेशनल साइबर कोआर्डिनेशन सेंटर (एनसीसीसी) के गठन पर विचार किया जा रहा है, जो परोक्ष रूप से इंटरनेट और मोबाइल फोन उपयोगकर्ताओं की गतिविधियों पर नजर रखेगा।

वास्तव में साइबर विस्तार के साथ सुरक्षा के खतरे भी बढ़े हैं, लेकिन निजता और सरकारी गोपनीयता को भी नए तरह से परिभाषित करने की जरूरत है। मगर नागिरकों की संविधान प्रदत्त मूलभूत स्वतंत्रता के साथ किसी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें