देर आयद, दुरुस्त आयद। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा दया याचिका ठुकराए जाने के बाद मुंबई पर हुए 26/11 के आतंकी हमले के दोषी अजमल कसाब को फांसी पर लटकाए जाने की घटना पर यह मुहावरा खरा उतरता है, लेकिन इतना काफी नहीं है। कसाब तो पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं का एक मोहरा भर था।
पाकिस्तान के टाल-मटोल के रवैये के चलते हाफिज सईद सरीखे मुंबई हमले के असली दोषी अब भी भारत के खिलाफ जहर उगलते हुए छुट्टा घूम रहे हैं। इसलिए कसाब को फांसी दिए जाने के बाद भी मुंबई हमले के अध्याय को बंद नहीं मान लिया जाना चाहिए। यह अध्याय तो तभी बंद होगा, जब पाकिस्तान का सरकारी तंत्र भारत-विरोधी आतंकियों को शह देने से तौबा करे और उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई भी करे।
फिलहाल, पाकिस्तान से ऐसी उम्मीद करना खली से तेल निकालने जैसा है। मगर, हमें पाकिस्तान की ओर देखने या उसे कोसने से पहले अपनी व्यवस्था और अपने तंत्र भी नजर डालनी होगी। निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कसाब के खिलाफ मुकदमे की प्रक्रिया पूरी होने और उसे फांसी की सजा की पुष्टि होने के बाद भी दया याचिका के निपटारे में अनावश्यक विलंब 26/11 के शहीदों के परिवारों की भावनाओं के साथ भद्दा मजाक नहीं तो क्या था।
पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने कसाब की दया याचिका को जिस तरह लटकाए रखा, वह भी हमारी न्याय प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगाने वाला है। अगर कुछ लोग कसाब को फांसी दिए जाने के समय को गुजरात विधानसभा के चुनाव से जोड़कर देखते हैं, तो इसमें क्या गलत है? इस बात के लिए सरकारी तंत्र की सराहना की जानी चाहिए कि वह ऑपरेशन एक्स को लेकर जरूरी गोपनीयता बरकरार रख सकी। अन्यथा ऐसे संवेदनशील मामलों में व्यर्थ का तनाव उत्पन्न होने का खतरा रहता है। कसाब को फांसी के बाद देश को इस बात का भी इंतजार रहेगा कि संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु जैसे और मामलों में सरकारी फाइलें किस तरह दौड़ती हैं।