शीतयुद्ध के खात्मे के बाद जब से यह दुनिया एकध्रुवीय हुई है, तब से अमेरिका न जाने कितनी बार लोकतंत्र, मानवाधिकार, समानाधिकार आदि के बारे में पूरे विश्व को सीख दे चुका है। लेकिन उसी मुल्क में पचास से अधिक प्रतियोगियों को पछाड़कर भारतीय मूल की एक युवती का मिस अमेरिका बनना, लगता है, महाशक्ति देश को हजम नहीं हो रहा।
नीना दावूलुरी ने जब से यह खिताब जीता है, सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ अभियान छिड़ गया है। कोई उन्हें हिंदू कर्मकांडों में विश्वासी बता रहा है, तो कोई उन्हें अरब आतंकवादी बताने में भी नहीं हिचक रहा! जबकि डॉक्टर दंपति की इस संतान की न सिर्फ पैदाइश और पढ़ाई अमेरिका में हुई है, बल्कि भारत के जिस शहर विजयवाड़ा से उनका संबंध है, वहां भी अभी तक परिवार से बाहर के लोग उन्हें नहीं जानते थे।
यह क्षुब्ध करने वाला उदाहरण है कि भारतीय मूल की एक युवती दमा और मोटापे को परास्त कर मिस अमेरिका बनती है, तब अचानक अमेरिकियों को उसके रंग और नस्ल की याद आती है।
यह हाल उस देश का है, जो खुद को प्रोफेशनल लोगों के स्वर्ग के रूप में प्रचारित करता है, और जिसकी श्रेष्ठता की कहानी दूसरे देशों से आए लोगों की मेहनत के बगैर संभव नहीं। सौंदर्य प्रतियोगिता जीतने वाली युवती को आतंकवादी बताना अपने अज्ञान का प्रदर्शन तो है ही, यह मिस अमेरिका जैसी प्रतिष्ठित प्रतियोगिता की ज्यूरी के प्रति अविश्वास जताना भी है।
लेकिन महाशक्ति देश की नस्लवादी सोच का यह अकेला उदाहरण नहीं है। भारतीय मूल की रिपब्लिकन गवर्नर निक्की हैले के खिलाफ नस्लवादी टिप्पणी डेमोक्रेटिक पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने की थी। यह कहा ही जाता है कि कटरीना तूफान के प्रभावितों में अफ्रो-अमेरिकियों की अधिकता के कारण तत्कालीन बुश प्रशासन ने राहत अभियान में देरी की थी। अमेरिका में सिखों को जिस तरह लगातार निशाना बनाया जाता है, वह नस्लवाद के सिवा और क्या है!
नीना दावूलुरी की जीत पर खिसियाए अमेरिकियों को शायद पता नहीं कि इस साल मिस अमेरिका की दो रनर्स अप भी एशियाई मूल की थीं, और टाइम पत्रिका ने इस बदलाव को सुखद मानते हुए टिप्पणी की है कि अमेरिकियों के ही चुने जाने के दिन गए।