रिजर्व बैंक ने 'पेमेंट बैंक' की जिस अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए 11 लाइसेंस देने का निर्णय लिया है, वह काम तो काफी पहले हो जाना चाहिए था। लेकिन देर से ही सही, वित्तीय समावेशन की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। दो वर्ष की कवायद के बाद अस्तित्व में आ रहा यह पेमेंट बैंक औपचारिक बैंकिंग सेवा से थोड़ा अलग होगा, जिसके जरिये खाते खोले जा सकेंगे और इसके जरिये विभिन्न तरह के भुगतान करने में मदद मिलेगी।
मगर ये बैंक न तो कर्ज दे सकते हैं और न ही इसमें सावधि जमा खाता खोला जा सकेगा। इनकी सीमा एक लाख रुपये तक की होगी और इनमें जमा धन का इस्तेमाल संबंधित संस्थान या एजेंसियां सरकारी बांड्स में कर सकेंगी। इसका सबसे बड़ा लाभ अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे भारतीय डाक सेवा के जरिये मिलेगा, जिसकी देश भर में 1.55 लाख शाखाएं हैं। हालांकि व्यावहारिक रूप से अस्तित्व में आने के बाद ही पता चलेगा कि इस पेमेंट बैंक से बैंकिंग प्रणाली और उपभोक्ताओं के व्यवहार में किस तरह का बदलाव आता है। लेकिन इससे देश की उस 42 फीसदी आबादी को जरूर फायदा होगा, जो अब भी बैकिंग सेवा के दायरे से बाहर है।
इसकी सफलता दूरसंचार और दूसरे कारोबार से जुड़ी उन कंपनियों की साख से भी जुड़ी होगी, जिन्हें इसके लाइसेंस दिए जा रहे हैं। डाक घरों को लेकर तो वैसे सवाल नहीं उठेंगे, लेकिन माइक्रो फाइनेंस के नाम पर जिस तरह की गड़बड़ियां सामने आई हैं, वैसे में इस नई बैंकिंग प्रणाली से जुड़ रही निजी कंपनियों को जरूर उन उपभोक्ताओं का विश्वास जीतना होगा, जो बैंक या वित्तीय संस्थाओं के नाम से खौफ खाते हैं। वास्तव में छोटे व्यापारी और मजदूरी पर गुजर-बसर करने वाले लोगों के लिए यह पेमेंट बैंक बड़ा संबल बन सकता है, बशर्ते कि जन धन और वित्तीय समावेशन की दूसरी योजनाओं से भी इसे जोड़ दिया जाए।
मनीऑर्डर भेजने में अभी पांच फीसदी का शुल्क लगता है, लेकिन यह पेमेंट बैंक इसका भी विकल्प बन सकता है। अच्छी बात यह है कि इस बैंक में खाता खोलना पड़ोस की दुकान से मोबाइल फोन के प्री पेड कनेक्शन लेने जैसा है, इसी से साफ है कि इसमें देश की बैंकिंग सेवा की तस्वीर बदलने की क्षमता है।