इस्लामिक स्टेट और बोको हरम जैसे संगठनों की क्रूरतापूर्वक कार्रवाइयों के कारण 2014 को आतंकी अत्याचारों का साल बताया गया, लेकिन आतंकवादी घटनाएं जिस निरंतरता में इस वर्ष भी जारी हैं, उन्हें देखते हुए किसी एक खास वर्ष को इनसे जोड़ने का बहुत औचित्य नहीं लगता। इस साल के शुरुआती छह महीनों का ही आंकड़ा देखें, तो बोको हरम और आईएस की आतंकवादी कार्रवाइयां स्तब्ध करने वाली हैं।
बोको हरम ने जहां नाइजीरिया जैसे देशों में इस साल सामूहिक हत्याकांडों को लगातार अंजाम दिया है, तो आईएस न सिर्फ निरंतर अपना विस्तार करता जा रहा है, बल्कि अपनी धार्मिक पहचान के आधार पर जिस तरह वह दूसरे मजहबों के लोगों और शहरों को निशाना बना रहा है, वह ज्यादा खतरनाक है। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि पिछले सप्ताह की शुरुआत अफगानिस्तान की संसद को निशाना बनाने से हुई, तो सप्ताह का अंत तीन देशों-फ्रांस, कुवैत और ट्यूनीशिया-में एक के बाद एक हमले से।
रमजान के पाक महीने में कुवैत की शिया मस्जिद में हमले की जिम्मेदारी आईएस ने ली है; सऊदी अरब और इराक में भी उसने इससे पहले शिया मस्जिदों को ठीक इसी तरह निशाना बनाया है। जबकि फ्रांस में अमेरिकी गैस फैक्टरी में एक व्यक्ति की हत्या करने का तरीका आईएस के बर्बर पैटर्न से मेल खाता है, तो ट्यूनीशिया में ब्रिटिश और फ्रेंच पर्यटकों को चुन-चुनकर निशाना बनाने की आतंकवादी कार्रवाई वहां हाई अलर्ट के बावजूद हुई है।
ट्यूनीशिया में निरंतर हो रहे हमलों से लगता है कि पश्चिमी पर्यटकों को निशाना बनाने के अपने एजेंडे में आतंकवादी वहां के पर्यटन की पहचान को ही खत्म कर देना चाहते हैं। विडंबना यह है कि आतंक के प्रसार के इस दौर में अमेरिका जैसे वे देश अब खामोश होने लगे हैं, जिनकी शुरुआती सक्रियता और समर्थन ने ही आतंकवाद को खाद-पानी देने का काम किया था। अमेरिका के नेतृत्व में आईएस के ठिकाने पर हुए हवाई हमलों के बावजूद जिस तरह यह आतंकवादी संगठन अपना विस्तार करते हुए हमारे पड़ोस में अपनी पैठ बनाने लगा है, वह ज्यादा चिंता की बात है। जाहिर-सी बात है, ऐसे में, सिर्फ अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना आतंकवाद से बचाव की गारंटी नहीं है, बल्कि बेहतर यही होगा कि किसी किस्म की कट्टरता को प्रश्रय नहीं दिया जाए।