जहां भुखमरी एक बड़ी समस्या रही है, और उदार अर्थनीति को लागू करने के बाद अमीरी-गरीबी की खाई जिस देश में तेजी से बढ़ी है, वहां खाद्य सुरक्षा विधेयक का लोकसभा से पारित होना एक बड़ा कदम है।
आजादी के बाद जो देश विकसित मुल्कों से खाद्यान्न की मदद के भरोसे था, उसने दशकों बाद हरित क्रांति के जरिये अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल की, और उसके कई दशक बाद अब देश की करीब 67 फीसदी आबादी को रियायती दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए कानून बनाने जा रहा है, तो इससे पता चलता है कि जरूरी कदम उठाने में हमने हमेशा ही बहुत देर की है।
बल्कि विडंबना तो यह भी है कि खाद्य सुरक्षा कानून लाने वाली यूपीए सरकार और इसके कुछ प्रावधानों की आलोचना करता विपक्ष-दोनों में से कोई वास्तविक रूप से उस आम आदमी के प्रति बहुत फिक्रमंद नहीं दिखता, जिसके लिए यह कानून बनाया जा रहा है।
वरना जब घरेलू और विश्व अर्थव्यवस्था बहुत खराब स्थिति में हो, हमारी सरकार को मजबूरन खर्च में कटौती करनी पड़ी हो, तब लोकसभा चुनाव से पहले सरकार एक ऐसे विधेयक को कानून की शक्ल देने में एड़ी-चोटी का जोर नहीं लगाती, जिस पर आधिकारिक रूप से करीब सवा सौ लाख करोड़ रुपये सालाना का खर्च बताया जा रहा है।
मुख्य विपक्षी दल भाजपा का हाल यह है कि एक तरफ तो वह मौजूदा आर्थिक बदहाली का ठीकरा सरकार के सिर फोड़ रही है, दूसरी तरफ खाद्य सुरक्षा विधेयक में आवंटन बढ़ाने की दलील देने से भी उसे इनकार नहीं है, जिससे सब्सिडी का बोझ और बढ़ेगा! मुलायम सिंह यादव इस प्रस्तावित कानून के शुरू से ही आलोचक रहे हैं, जबकि इसका सर्वाधिक लाभ उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को ही मिलने वाला है।
लेकिन जितना महत्वाकांक्षी यह कदम है, उसमें केवल कानून बना देने से ही बात नहीं बनेगी, यह भरोसा भी दिलाना होगा कि इसका वास्तव में गरीबों को लाभ मिलेगा। गरीबों की शिनाख्त से लेकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली की मौजूदा कमियों को पूरी तरह खत्म करने के बाद ही यह योजना कारगर हो पाएगी। यानी असली काम तो इसके कानून बन जाने के बाद शुरू होगा।