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धार्मिक हमलों के खिलाफ

Tue, 17 Feb 2015 08:24 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देर से ही सही धार्मिक आधार पर हिंसा और विद्वेष फैलाने वालों को दो टूक चेतावनी दी है और कहा है कि बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक वर्ग, उन्हें किसी दूसरे समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उनका यह बयान हाल ही में दिल्ली में गिरिजाघरों पर हुए हमलों और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत के संदर्भ में की गई तल्ख टिप्पणी के बाद आया है।
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दो भारतीयों कुरियाकोस एलिएस चवारा और मदर यूफ्रेसिया को संत की उपाधि दिए जाने के सम्मान में आयोजित एक समारोह में प्रधानमंत्री ने गांधी और बुद्ध का जिक्र करते हुए कहा कि सभी धर्मों के प्रति सम्मान की भावना प्रत्येक भारतीय के डीएनए में होनी चाहिए। वास्तव में दुनिया में भारत की पहचान ऐसे देश के रूप में है, जहां व्यापक रूप से धार्मिक सहिष्णुता रही है। मगर मोदी की अगुआई में पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली जीत के बाद से देश में धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता को लेकर नई बहस ही छिड़ गई है। मोदी की पार्टी ने धर्मनिरपेक्षता को हमेशा अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के औजार के तौर पर ही देखा है। इस लिहाज से उनका यह बयान एक बड़े परिवर्तन का संकेत देता है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

गुजरात दंगों के मामले में अदालत ने उन्हें दोषी नहीं पाया है, लेकिन वे जानते हैं कि इसके बावजूद उनकी छवि पर इसकी छाया मंडराती रहती है। दूसरी ओर यह भी दिख रहा है कि उनकी अगुआई में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आनुषांगिक संगठन और भाजपा का एक हिस्सा हिंदुत्व के एजेंडे पर आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियों को सबसे अनुकूल मान रहा है। धर्मांतरण और 'घर वापसी' पर मचा शोर-शराबा तथा हिंदू महिलाओं के चार-पांच बच्चे पैदा करने जैसे विवादास्पद बयान इसी की कड़ी लगते हैं।
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हालांकि खुद मोदी ने 'सबका साथ सबका विकास' का नारा दिया है, जिसे उन्होंने इस कार्यक्रम में भी पुरजोर तरीके से दोहराया है। विडंबना है कि संघ विकास को हिंदुत्व से भी जोड़कर देखता है। प्रधानमंत्री के इस बयान को दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली करारी हार से जोड़कर न भी देखें, तो भी इसके निहितार्थ बिल्कुल स्पष्ट हैं। लाख टके का सवाल है कि क्या संघ उनकी बात सुन रहा है?
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