अफजल गुरु को दी गई फांसी दो वजहों से न्यायोचित है- एक तो उसने लोकतंत्र के सर्वोच्च प्रतीक को ध्वस्त करने की साजिश रची थी, और दूसरा यह कि उसके दूसरे साथियों के सस्ते में छूट जाने के बावजूद फांसी की उसकी सजा सर्वोच्च न्यायालय ने बहाल रखी थी।
जाहिर है, घटनास्थल पर न पकड़े जाने, किसी की हत्या नहीं करने और सिर्फ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर दोषी ठहराए जाने के बावजूद अफजल गुरु का अपराध उन आतंकवादियों से कम नहीं था, जो संसद के दरवाजे तक पहुंचने की दुस्साहसी कोशिश में मार गिराए गए थे। इसमें भी शक नहीं कि तीन महीने के भीतर पहले कसाब, और अब अफजल को फांसी देकर इस देश ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी ढुलमुल छवि कमोबेश बदली है।
संसद को निशाना बनाने की कोशिश और मुंबई पर आतंकी हमला एक शक्तिशाली लोकतंत्र की हमारी छवि पर धब्बे की तरह थे। यह तो नहीं कह सकते कि ये धब्बे पूरी तरह धुल गए हैं, पर दोषियों को सख्त दंड देने की आश्वस्ति भी कम नहीं है। अलबत्ता मुश्किल यह है कि अफजल को फांसी देने से वे सवाल मर नहीं जाते, जो कई तरफ से उठ रहे हैं।
न्याय का तकाजा तो यही है कि दोषियों को भी बचाव का पूरा अवसर मिले, जैसा कि हमने कसाब के मामले में देखा था। लेकिन अब अगर यह प्रश्न उठ रहा है कि अफजल को योग्य वकील मुहैया कराने की वैसी उदारता नहीं दिखाई गई, तो यह हमारे जैसे लोकतंत्र के लिए कोई बहुत अच्छा संकेत नहीं है। फिर जनमत, दबाव समूह और राजनीति के आधार पर जिस तरह फांसी देने या न देने के फैसले लिए जाते हैं, वह तो और भी खतरनाक है।
ऐसा क्यों है कि लोकसभा चुनाव से पहले जब भाजपा विकास और हिंदुत्व के जुमले उछालती है, ठीक तभी कांग्रेस अफजल गुरु को फांसी देकर महफिल लूट लेने का भाव दिखाती है! सर्वोच्च न्यायालय ने 2005 में अफजल की फांसी की सजा बरकरार रखी थी, ऐसे में यूपीए सरकार ने उन्हें फांसी के तख्ते पर पहुंचाने में आठ साल क्यों लगाए? लेकिन इस मोड़ पर अब हमें मृत्युदंड के औचित्य पर भी गहराई से विचार करना होगा; एक पारदर्शी लोकतंत्र को अपनी चुस्त प्रशासन-व्यवस्था पर गर्व करना चाहिए, फांसी जैसे कठोर दंड पर नहीं।