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तूफान के गुजर जाने के बाद

Sun, 13 Oct 2013 05:50 PM IST
नई दिल्ली
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यह संतोष की बात है कि ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटों से टकराने वाले फैलिन तूफान ने वैसी तबाही नहीं मचाई, जैसी आशंकाएं थीं। इसके बावजूद तकरीबन 2,400 करोड़ रुपये की धान की फसल, लाखों घर और पेड़ इसकी जद में आने से बर्बाद हुए हैं और कुछेक मौतें भी हुई हैं। तेज हवाओं और समंदर से उठती ऊंची लहरों के थपेड़ों ने संचार, बिजली और परिवहन व्यवस्था को भी ठप किया, जिनके नुकसान का आकलन अभी किया जाना है।
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मगर, यह 1999 में ओडिशा की रीढ़ तोड़ देने वाले भयावह तूफान जैसा नहीं था, जिसने तकरीबन 10,000 लोगों को लील लिया था। यह 2005 में अमेरिका को हिलाकर रख देने वाले कटरीना की तरह भी नहीं था, जैसा कि अमेरिकी और ब्रिटिश मौसम विशेषज्ञ आशंका जता रहे थे; उनका अनुमान था कि फैलिन पांचवीं श्रेणी का ही चक्रवाती तूफान है, जिसमें हवा की गति 315 प्रति घंटे तक हो सकती है।

मगर अमूमन सटीक भविष्यवाणी करने में नाकाम रहने वाले हमारे मौसम विभाग ने पिछले कुछ समय में खुद को काफी परिष्कृत किया है, जिसका नतीजा है कि फैलिन को लेकर उसके तकरीबन सारे आकलन सही साबित हुए।
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असल में, 2004 में आई सूनामी के बाद तूफान और सुनामी जैसी आपदाओं से बचाव के हमारे तंत्र में काफी तब्दीली आई है। इसमें सेना के नेशनल डिसॉस्टर रिस्पांस फोर्स (एनडीआरएफ) की अहम भूमिका को नकारा नहीं किया जा सकता। इसके अलावा केंद्रीय एजेंसियों और ओडिशा सरकार के बीच बेहतर तालमेल ने भी तूफान से लड़ने में मदद की। वरना, कुछ महीने पहले उत्तराखंड में आई तबाही के दौरान देखा गया था कि किस तरह राज्य सरकार और केंद्र के बीच तालमेल ही नहीं बन पा रहा था।

भले ही, लाखों लोगों को तूफान से बचा लिया गया है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि उनमें से बहुतों से जीने का जरिया ही लहरों ने छीन लिया। पिछली आपदाओं के समय भी देखा गया कि तात्कालिक रूप से तो पीड़ितों को राहत पहुंचा दी जाती है, लेकिन अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के लिए उन्हें अकेला छोड़ दिया जाता है। ऐसी आपदाओं में हमेशा प्रभावित होने की आशंका में जीने वाले ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों से बेहतर इसे भला कौन जानता है!
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