चाहे लश्कर सरगना के निर्देश पर बड़ी आतंकी कार्रवाई के लिए आते हुए उसे सुनियोजित तरीके से धर लिया गया हो या पाकिस्तान में अपनी अनदेखी से आहत आखिरी वक्त गुजारने की हसरत लिए भारत में घुसते समय वह शिकंजे में फंस गया हो, अब्दुल करीम टुंडा की गिरफ्तारी निर्विवाद रूप से एक बड़ी सफलता है।
अबू सलेम की मंशा पर पानी फिरने और इकबाल मिर्ची की मौत के बाद टुंडा के पकड़े जाने से आतंकवाद के खिलाफ अगर हमारा हौसला बुलंद हुआ है, तो यह पाकिस्तान में बैठे भारत-विरोधी गतिविधियों का जाल बुनते आतंकी सरगनाओं के लिए उतना ही हताशाजनक है।
सर्वाधिक वांछित अपराधियों में से एक टुंडा उर्फ हकीम जी के अपराधों की सूची उसकी उम्र की तरह ही लंबी है। देश में कम से कम चालीस बम धमाकों में उसका हाथ है। पोटेशियम क्लोरेट और अमोनियम नाइट्रेट को मिलाकर बम बनाने में उसकी महारत इतनी रही है कि पिछले दिनों बोधगया में हुए विस्फोटों तक में उसकी संलिप्तता का संदेह है।
शुरुआती जीवन में बढ़ई, कबाड़ कारोबारी, रंगरेज, कपड़ा व्यवसायी, होम्योपैथ डॉक्टर जैसे विभिन्न पेशे उसने जिस तरह अपनाए, आतंकवाद के रास्ते पर चलने के बाद भी बम बनाने से लेकर युवाओं को इस रास्ते पर लाने, फंड उगाहने और मदरसा चलाने जैसे कई काम उसने किए।
पाकिस्तान में वह दाऊद इब्राहिम का नजदीकी था, लश्कर के मुखिया हाफिज सईद के साथ अक्सर घूमता था, तो सिमी और बब्बर खालसा इंटरनेशनल से भी उसकी साठगांठ थी। उसने बांग्लादेश में आतंकियों को प्रशिक्षण दिया, तो नेपाल में लंबे समय तक रहते हुए भारत में जाली नोटों की आपूर्ति का काम करता रहा था।
लिहाजा अब वह अपने गुनाहों की सजा तो खैर भुगतेगा ही, उसकी गिरफ्तारी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उससे मुंबई हमले समेत कई आतंकी घटनाओं और पाकिस्तान में सक्रिय भारत-विरोधी नेटवर्क के बारे में बहुत कुछ पता चल सकेगा।
टुंडा की गिरफ्तारी का एक सबक यह भी है कि कोई चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो, कानून से नहीं बच सकता। उम्मीद करनी चाहिए कि टुंडा की गिरफ्तारी कई और दुर्दांत आतंकवादियों को कानून के शिकंजे में कसने की वजह बनेगी।