आंध्र प्रदेश का विभाजन और तेलंगाना के रूप में देश के 29वें राज्य का गठन अब सिर्फ औपचारिकता रह गई है, जिसमें कुछ महीने लग सकते हैं। अपने दस वर्ष के शासन में सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही यूपीए सरकार ने यह फैसला राजनीतिक मजबूरी में लिया है, यह किसी से छिपा नहीं है।
असल में वाईएस राजेशखर रेड्डी की मौत और उनके बेटे जगनमोहन रेड्डी की बगावत के बाद आंध्र प्रदेश के सारे राजनीतिक समीकरण उलट-पुलट गए। वरना पिछले आम चुनाव में कांग्रेस ने सर्वाधिक 33 सीटें आंध्र से ही जीती थीं। बेशक तेलंगाना कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक दांव है, जहां उसकी नजर 17 लोकसभा सीटों पर होगी।
लेकिन यह भी सच है कि तेलंगाना की मांग छह दशक से भी अधिक पुरानी है। खुद यूपीए सरकार ने तेलंगाना राष्ट्र समिति के नेता के चंद्रशेखर राव की भूख हड़ताल को तोड़ने के लिए दिसंबर, 2009 में इसका ऐलान कर दिया था, मगर घोषणा करने में उसे भी चार वर्ष लग गए।
उसके इस कदम से यह सवाल फिर केंद्र में आ गया है कि क्या छोटे राज्य विकास की गारंटी हैं? हमारे सामने 13 वर्ष पहले बने तीन छोटे राज्य उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के उदाहरण हैं, जिन्हें विकास के मामले में आदर्श तो नहीं ही कहा जा सकता।
उत्तराखंड जहां कुप्रबंधन की मिसाल बना हुआ है, जैसा कि हाल की प्राकृतिक आपदा ने दिखाया, वहीं राजनीतिक रूप से अस्थिर झारखंड में कुछ दिन पहले ही नौवें मुख्यमंत्री ने कमान संभाली है, तो राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ में माओवादी समस्या और भयावह हुई है। मानव विकास सूचकांक के मामले में भी ये राज्य फिसड्डी हैं।
इसके उलट आंध्र प्रदेश सकल घरेलू उत्पाद के मामले में देश का तीसरा बड़ा राज्य है, जिसमें तेलंगाना की हिस्सेदारी 62 फीसदी की है। यही नहीं, इस क्षेत्र में देश का 20 फीसदी कोयला भंडार भी है। जाहिर है, तेलंगाना में विकास की भरपूर संभावनाएं हैं।
बहरहाल यूपीए ने फौरी तौर पर कुछ राहत जरूर हासिल कर ली है, लेकिन उसने एक ऐसा पिटारा खोल दिया है, जिससे उसकी मुसीबत कम नहीं होने वाली, क्योंकि तेलंगाना के बाद गोरखालैंड, बोडोलैंड, बुंदेलखंड से लेकर विदर्भ तक क्षेत्रीय आकांक्षाएं फिर से जोर मारने लगी हैं।