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क्या यह साल बॉलीवुड के लिए सेक्स कॉमेडी के नाम होगा?

Thu, 31 Dec 2015 07:02 PM IST
दिनेश श्रीनेत/अमर उजाला, दिल्ली
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बॉलीवुड दर्शकों के लिए साल की शुरुआत सेक्स कॉमेडी से होने जा रही है। फिल्में और भी हैं मगर 'क्या कूल हैं हम 3' और 'मस्तीजादे' ही हर तरफ छाई हुई हैं। ये दोनों फिल्में जनवरी में रिलीज होंगी। इसी क्रम में ग्रेट ग्रैंड मस्ती और एकता कपूर की महत्वाकांक्षी फिल्म 'ट्रिपल एक्स' भी 2016 में सामने आएगी। 'ट्रिपल एक्स' अपने कलाकारों के साथ न्यूडिटी क्लॉज साइन कराने वाली पहली भारतीय फिल्म होने के कारण पहले ही चर्चा में आ चुकी है। कुल मिलाकर इस साल सेक्स का ओवरडोज देखने को मिल सकता है।
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ऐसा नहीं है कि हिन्दी फिल्मों के दर्शक पहली बार इस तरह की फिल्में देख रहे हैं। एक वक्त था जब दक्षिण के निर्देशकों के साथ जितेंद्र, श्रीदेवी, कादर खान और शक्ति कपूर की चौड़की इसी तरह की फिल्मों के साथ छाई हुई थी। मास्टर जी, हिम्मतवाला, मवाली, तोहफा जैसी तमाम फिल्में भड़कीले डांस, एक्शन और डबल मीनिंग डॉयलॉग के दम पर भीड़ खींच लेती थीं। मराठी के दादा कोंडके ने अस्सी के दशक में लगातार ऐसी कई फिल्में बनाईं। सन 2000 की शुरुआत में होमेसेक्सुअल जोक्स मेनस्ट्रीम सिनेमा में जगह लेने लगे, मगर मामला यहीं तक सीमित रहा।

लेकिन अब वक्त बदलने के साथ डबल मीनिंग फिल्में सेक्स कॉमेडी में बदल गई हैं। अब फर्क इतना है कि इन फिल्मों ने मिडिल क्लास में अपनी घुसपैठ कर ली है। अब ज्यादातर लोग इन्हें दूसरे दर्जे की फिल्में नहीं मानते हैं। इनके जोक्स पर आराम से हँस लेते हैं। अब इन फिल्मों में डबल मीनिंग जैसा भी कुछ नहीं रह गया है, ज्यादातर संकेत खुले और एक ही अर्थ की ओर इशारा कर रहे होते हैं। पश्चिम में सेक्स कॉमेडी का चलन लंबे समय से है और 60 के दशक से ऐसी फिल्में दर्शक स्वीकार करने लगते थे।
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भारत में सेक्स लंबे समय तक और यहां तक कि अभी भी खुली चर्चा में शामिल नहीं है। इसके विपरीत सेक्स संबंधी सांकेतिक हँसी-मजाक हमारी सोसाइटी का अहम हिस्सा रहा है। हिन्दी समाज में बहुत से रिश्तों में इस तरह के मजाक आसानी से स्वीकार कर लिए जाते थे। देवर-भाभी या जीजा-साली से जुड़े जोक्स या गीत भी खूब पॉपुलर थे और अभी भी ग्रामीण इलाकों में यह खूब चलते हैं। तो इंडियन सोसाइटी का इरोटिसिज़्म पश्चिम या कहें तो अपने करीबी एशियन देशों से नितांत भिन्न था। यह समाज में घुलामिला तो था मगर कुछ दबे-ढंके अंदाज में।

मुझे लगता है कि इस साल आने वाली फिल्में और हमारे समाज का विश्लेषण इस लिहाज से करना दिलचस्प होगा कि अब दबे-छुपे तरीके से बात करने की बजाय कहीं न कहीं हमारा समाज इस पर मुखर होना चाहता है। पिछले साल के मुकाबले ये सारी फिल्में बहुत मुखर हैं और खुद को सेक्स कॉमेडी से आगे पोर्न कॉमेडी और इरोटिक ड्रामा कहलाना चाहती हैं। जब सामाजिक ढांचा हमें किसी बात को कहने का स्पेस नहीं देता तो हमेशा अभिव्यक्ति के लिए कलाओं का सहारा लिया जाता है। कलाएं एक झीना पर्दा बन जाती हैं जो आवरण में रहने का भ्रम बनाए रखती हैं।

पिछले सालों में सोशल मीडिया ने सैद्धांतिक तौर पर इसकी पृष्ठभूमि बनाई है। लोगों ने बहुत से मुद्दों पर खुद से बातचीत की पहल की है और मुखर हुए हैं। यह भी अंदेशा है कि अगले साल सी ग्रेड फिल्में बनाने वालों का धंधा या तो मंदा रहेगा या बंद होने के कगार पर पहुंच जाएगा। क्योंकि एकता कपूर जैसों के मुकाबले उनकी फिल्में ज्यादा साफ-सुथरी दिखने लगेंगी। दूसरे यह तय है कि इनकी शुरुआती सफलता से उत्साहित होकर अगले साल बहुत से फिल्ममेकर दर्जनभर और सेक्स कॉमेडी लेकर मैदान में आ जाएंगे। मुझे नहीं लगता कि इन फिल्मों के लिए हमें बहुत ज्यादा जजमेंटल होने की जरूरत है। हर समाज का अपना सेंसर सिस्टम काम करता है। अधिकता हमेशा उबाने वाली होती है चाहे वह सेक्स ही क्यों न हो।
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