हर किसी की दुनिया उसका परिवार होती है। जब तक दिन में 2 से 3 बार अपने घर में बात न कर लें तब तक शायद ही किसी का मन लगता हो। हम अपनी लाइफ में कुछ भी हो जायें लेकिन परिवार के बिना हम कुछ नहीं होते।
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हमारा परिवारजीवन का एक ऐसा हिस्सा है जिससे हम चाहते हुये भी कभी दूर नहीं होना चाहते।
घर का खाना
बाहर रह कर हर रोज होटेल और पीजी का खाना खाकर मन उकता सा जाता है। जब कभी भी हमें कुछ अच्छा खाने का मन होता है तो हमें अपने घर के खाने की याद आती है। मां के हाथों से पकी रोटियां तब सब से ज्यादा मिस होती हैं।
अगर हम खुद से भी बनाते हों तब भी घर के स्वादिष्ट खाने की याद आ ही जाती है। अगर हम किसी त्योहार पर घर न जा पायें तो उस दिन और भी ज्यादा घर के खाने की याद आती है।
अपने कमरे की याद
हम बाहर रह कर भी अपने घर में अपने कमरे को याद करते हैं, जहां हमारी किताबें, हमारा बिखरा हुआ बिस्तर और उस पर मां की डांट याद आ ही जाती है।
गंदे कमरे को साफ करने के लिए मां की तरफ से मिलने वाला आदेश हमें मानना ही पड़ता है, जिसे हम कभी मिस नहीं करना चाहेंगे, क्योंकि मां की डांट में भी प्यार होता है।
बचपन के दोस्तों को
हमें हमारे वो दोस्त याद आते हैं जिनके साथ हम बचपन में शैतानियां करते थे। उनके साथ खेलते थे। बाहर जाने के बाद हमें वो सारे पल याद आते हैं, जो हमने अपने दोस्तों के साथ बितायें हैं।
बचपन में हम जिनकी टिफिन खाया करते थे, जिनके साथ स्कूल जाया करते थे। वो सारी बाते हमें याद आती हैं जब हम अपने घर से दूर रहते हैं।
घर की सलाह
बाहर रह कर हम अपने घर वालों की सलाह को जरूर मिस करतें हैं। छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बातों पर घर के लोगों की सलाह हमें मुसीबतों से निकलने में बहुत मदद करती थी।
आज भी जब कभी हमें कोई दिक्कत होती है तो हम अपने घर की सलाह लेना नहीं भूलते। घर के लोगों की सलाह हमें एक नया रास्ता दिखाती है।
मां से अटूट रिश्ता
हमारे परिवार में कोई न कोई ऐसा होता है जिससे हमारा अटूट रिश्ता होता है। अगर घर में किसी से हमारा अटूट बंधन होता है वो हमारी मां है। जिससे हम हमेशा एक अलग सा एहसास महसूस करतें हैं।
हमें कोई भी प्राब्लम होती है तो हम अपनी मां से जरूर शेयर करते हैं। हम अपनी अधिकतर प्राब्लम्स मां को जरूर बताते हैं क्योंकि हमें ये यकीन होता है कि मां के पास हमारी परेशानी का हल जरूर होगा। बाहर रह कर हम कई बार इसे मिस करते हैं।
हम कितने भी दिल के मजबूत क्यों न हों, लेकिन कभी न कभी हमें एक भावानात्मक सहारे की जरूरत पड़ती ही है। वो जरूरत हमारे परिवार के अलावा कोई पूरी नहीं कर सकता।
बाहर रह कर हमें कई बार एक ऐसे सहारे की जरूरत होती है जो हमें हमारी मुश्किल से निकाल सके या हमें एक भावात्मक सहारा दे सके। ऐसे समय में हम अपने परिवार को निश्चित तौर पर मिस करते हैं।