राहुल और रोहन, महज साल भर के अंतर वाले इन दोनों भाइयों की परवरिश एक ही माहौल में हुई, एक ही स्कूल में पढ़ते हैं और लगभग दोनों के दोस्त भी एक ही हैं।
फिर भी जब पिछले साल राहुल के 90 प्रतिशत अंकों से 12वीं पास करने के बाद इस साल रोहन के 12वीं में 68 प्रतिशत अंक आए तो उसकी दुनिया ही बदल गई।
माता-पिता की उम्मीदों पर खरा न उतर पाने का दुख, अच्छे कॉलेज में दाखिला न मिल पाने की चिंता, टूटा हुआ आत्मविश्वास और अपने भीतर पनपती हीन भावना की वजह से न सिर्फ रोहन सबसे अलग-थलग हो गया बल्कि इसे ही अपनी दुनिया का अंत मान लिया।
रोहन जैसे कई बच्चे हैं जो परीक्षा में कम अंक को एक सदमे की तरह लेते हैं और कई बार अवसाद में आकर आत्महत्या जैसा कदम तक उठा लेते हैं। लेकिन यह उनकी हर काबिलियत का पैमाना तो नहीं।
वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ. डी.एस. नरबान का मानना है कि परीक्षा में कम या औसत अंक लाने वाले बच्चों की मानसिक स्थिति इतनी नाजुक होती है कि उन्हें अगर संभलने का पूरा अवसर न मिले तो वे अवसाद में घिर सकते हैं। और कई बार इस स्थिति से उबरने का विकल्प न मिलने पर वे आत्महत्या का ख्याल मन में ला सकते हैं।
इन बदलावों को न करें अनदेखा
डॉ. नरबान के अनुसार, परीक्षा में मनचाहा परिणाम न मिल पाने पर बच्चों को दुख होना, ठेस लगना या कुछ समय तक आत्मविश्वास कमजोर होना हो सामान्य हो सकता है लेकिन अगर उनके व्यवहार में खास परिवर्तन लगें तो अभिभावकों इसे जरा भी अनदेखा नहीं करना चाहिए। मसलन,
- बिना किसी वजह बहुत उदास रहना।
- नींद का समय बदलना, अधिक नींद लेना या बहुत कम नींद लेना।
- खानपान में अधिक रुचि न लेना।
- लगातार नंबर कम आना या पढ़ाई से मन उचटना।
- अगर बच्चा अपनी चीजों का बहुत ख्याल रखता हो और अचानक से वह अपने बैग, जूते, खिलौने,किताबों आदि को लेकर बेफिक्र हो जाए।
अभिभावकों का बड़ा है रोल
कई बार अभिभावकों की बहुत अधिक महत्वाकांक्षा बच्चों के लिए मानसिक बोझ से कम नहीं होतीं। ऐसे में परीक्षा में कम नंबर या स्कूल में औसत परफॉर्म करने वाले बच्चों के मनोबल कगो तोड़ने के लिए ये वजहें काफी होती हैं।
- हर समय अपने भाई-बहन या दूसरों के बच्चों के साथ तुलना करना।
- खुद जो न बन सके, उसे बच्चों पर थोपना।
- बच्चों से बहुत अधिक उम्मीद लगाना।
- बच्चे की योग्यता को अनदेखा करना।
- ट्यूशन पर अधिक निर्भरता और वे क्या करते हैं इसके लिए समय न निकाल पाना।
बदलें अपना नजरिया, फिर उनका नजरिया
परीक्षा में औसत अंक लाना या अपने भाई-बहनों की तरह परफॉर्म न कर पाना जिंदगी का अंत नहीं है। हर बच्चे की अपनी काबिलियत है और अपनी कमियां हैं। जरूरी नहीं कि आपका बच्चा इन्हें समझता हो पर बड़ों के लिए इन्हें समझना ही उसे अवसाद से बचाने का एकमात्र तरीका है।
इसके लिए जरूरी है कि अभिभावक दो बातों पर हमेशा ध्यान दें- उनके बच्चे का रुझान क्या है और उसकी योग्यता कितना ही। इसी आधार पर उसका मनोबल बढ़ाएं। वहीं बच्चों में दिनचर्या बनाने, अपने रुझानों को समझकर सही दिशा में आगे बढ़ने और स्वस्थ प्रतियोगिता की भावना को बढ़ाना दें।
बिल गेट्स, ज्ञानी जैल सिंह, धीरु भाई अंबानी, मार्क ज्यूकरबर्ग जैसी कई शख्सियत हैं जो पढ़ाई में अव्वल न होने के बावजूद भी इतनी सफल हैं कि आज वह हर किसी के लिए उदाहरण हैं।
परीक्षा के परिणाम जीवन का अंत नहीं हैं और आगे बढ़ने के लिए विकल्पों की कमी नहीं है, यह समझ अगर अभिभावक बच्चों में डालेंगे तो उनका मनोबल किसी परिस्थिति में नहीं टूटेगा।