प्रॉस्टेट ग्रंथि कैंसर टेस्ट जो यह बताता है कि एक ट्यूमर कितना गंभीर है। इसके बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि आधे से अधिक मामलों में यह परीक्षण बीमारी की गंभीरता को वास्तविकता से कम आँकता है।
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847 व्यक्तियों पर एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि प्रॉस्टेट ग्रंथि कैंसर परीक्षण के बाद 415 में से जिन 209 लोगों को बताया गया था कि उनका कैंसर धीरे-धीरे बढ़ रहा था, उनकी बीमारी काफ़ी आक्रामक तरीक़े से बढ़ी।
कुल 415 लोगों में से क़रीब एक तिहाई व्यक्तियों में यह बीमारी लगभग पूरे शरीर में फैल गई।
इसलिए वैज्ञानिक कैंसर की प्रकृति निर्धारित करने के लिए बेहतर परीक्षण की ज़रूरत महसूस कर रहे हैं।
पुरुषों को ख़तरा
यह ब्रिटेन के पुरुषों को होने वाला सबसे सामान्य कैंसर है। वहाँ हर साल प्रॉस्टेट ग्रंथि कैंसर के 41,700 नए मामले सामने आते हैं और हर साल क़रीब 10,800 लोगों की मौत हो जाती है।
प्रॉस्टेट मूत्राशय और शिश्न के बीच स्थित एक ग्रंथि है, जो मलाशय के ठीक सामने होती है।
इस अध्ययन के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने 2007 और 2011 के बीच ऑपरेशन के पहले और बाद में कैंसर की स्थिति का मूल्यांकन किया गया।
इस शोध के लेखक और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में यूरोलॉजिकल सर्जन ग्रेग शॉ कहते हैं कि उन व्यक्तियों की संख्या 'चौंकाने' वाली थी, जिनका पहली बार सही ढंग से परीक्षण नहीं किया गया।
उन्होंने कहा कि यह शोध ब्रिटेन के पुरुषों के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण है क्योंकि बाहरी देशों में होने वाले प्रॉस्टेट कैंसर से हमेशा इसकी तुलना नहीं हो सकती।
शुरुआती अवस्था वाले क्लिक करें कैंसर की स्थिति में व्यक्ति को ऑपरेशन,प्रॉस्टैट ग्रंथि हटाने,या सक्रिय निरीक्षण का विकल्प दिया जाता है, जहाँ डॉक्टर रोज़ाना ख़ून की जाँच और परीक्षण करते हैं।
'सुधार की संभावना'
शॉ कहते हैं कि अगर एक व्यक्ति सक्रिय परीक्षण का विकल्प चुनता है तो उनमें से 30 फ़ीसदी लोगों को आवश्यक रूप से पाँच साल बाद कीमोथेरेपी जैसा विक्लप अपनाना होगा।
उन्होंने कहा, "यह दिखाता है कि यहाँ सुधार की संभावना है।"
लेकिन उन्होंने कहा कि इस अध्ययन पक्षपात पूर्ण होने की संभावना है क्योंकि कुछ लोगों को कैंसर की स्थिति गंभीर होने का संकेत दिया गया होगा, जिसके कारण उन्होंने ऑपरेशन जैसा विकल्प अपनाया होगा।
प्रॉस्टैट ग्रंथि कैंसर
ब्रिटेन में हर साल प्रॉस्टैट ग्रंथि कैंसर के 41,700 नए मामले सामने आते हैं
वह कहते हैं कि इसलिए इस अध्ययन को निश्चित तौर पर उन लोगों का प्रतिनिधि अध्ययन नहीं माना जा सकता है, जिन्होंने सक्रिय परीक्षण का विकल्प चुना था।
शॉ कहते हैं कि बायोप्सी के एक नमूने की जाँच को क्लिक करें कैंसर परीक्षण का हिस्सा बनाया जाना चाहिए जो आमतौर होने वाले बायोप्सी से अधिक टिशू सैंपल्स पर ध्यान देता है।
बायोप्सी में शरीर से बाहर निकाले गए ऊतकों की जाँच बीमारी की गंभीरता के परीक्षण के लिए किया जाता है। ज़्यादा सैंपल्स का चयन कैंसर की साफ़-साफ़ स्थिति की जानकारी दे सकता है।
उपचार की जानकारी
उन्होंने कहा कि इसके लिए एमआरआई स्कैन को भी बेहतर बनाना चाहिए।
प्रॉस्टेट कैंसर यूके के शोध निदेशक डॉक्टर इएन फ़्रेमे कहते हैं, "प्रॉस्टेट कैंसर की सटीक जाँच इस बीमारी के क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती है।"
वह बताते हैं, "अध्ययन के नतीजे इस बात को प्रमुखता से सामने लाते हैं कि वर्तमान के परीक्षण किसी क्लिक करें व्यक्ति में कैंसर की पूरी तस्वीर सामने नहीं लाते, इसके कारण डॉक्टर और व्यक्तियों को तथ्यों के बिना कठिन फ़ैसला करने की स्थिति में छोड़ देते हैं।"
वह कहते हैं कि जबतक परीक्षणों में सुधार होता है, यह बेहद महत्वपूर्ण है कि लोग अपने डॉक्टरों से कैंसर उपचार के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं की जानकारी हासिल करें।