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छोटे कपड़े, रेप और सेक्स एजुकेशन पर खुलकर बोलीं मॉडल्स

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औरते कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं और जब पेशा मॉडलिंग का हो तो उनके लिए चुनौतियां कम नहीं होतीं। छोटे कपड़े काम का हिस्सा हो सकते हैं, इस सोच को अपनाना अभी हमारे लिए बहुत मुश्किल है। ऐसा मानना है चंडीगढ़ की रहने वाली जैसमीन का। वह बताती हैं, ''कपड़े छोटे होना किसी भी तरह के अपराध की वजह कतई नहीं हो सकता।
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अगर इस समाज में लड़कियों का स्कर्ट पहनना गलत है तो पांच साल की बच्ची से लेकर 60 साल की बुजुर्ग तक के साथ बलात्कार क्यों होते हैं?''

वहीं इस बारे में गुरुषा का मानना है कि मीडिया और फिल्मों में होने वाला एक्सपोजर आम जिंदगी से बेहद अलग है। लेकिन लड़कियों को क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं, यह उनकी व्यक्तिगत सोच हो सकती है।

दिल्ली से आई नेहा तुरान के अनुसार, ''अगर दूसरे देशों की तरह हमारे देश में वैश्यालयों को कानूनी तौर पर मंजूरी दे दी जाए तो हो सकता है महिलाओं पर होने वाले अपराधों को कुछ हद तक कम किया जा सके। इसके लिए लोगों की सोच और प्रशासन की कमजोरियां ही जिमेमेदार हैं, न कि महिलाओं का पहनावा।''
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कक्षा 8 से ही जरूरी है सेक्स जागरूकता

लखनऊ की अंकिता का मानना है कि जिस तरह सभी विषयों पर जानकारी स्कूलों में जरूरी है, उसी तरह सेक्स से जुड़े पहलुओं पर भी जानकारी जरूरी है। अगर कक्षा 8 से ही यौन शिक्षा स्कूलों में दी जाए तो इसमें क्या हर्ज है।

वहीं, जैसमीन का मानना है कि जिस तरह अगर स्कूलों में यौन शिक्षा को जैविक विज्ञान के रूप में पढ़ाया जाए तो इसमें अजीब लगने जैसा कुछ नहीं है। बल्कि यह सही उम्र में हमें जागरूक ही बनाएगा।

इस बारे में नेहा कटियार बताती हैं, ''स्कूलों में अगर लड़कों और लड़कियों को अलग-अलग कक्षाओं में पुरुष व महिला शिक्षक सेक्स के प्रति जागरूक बनाएं तो इसमें न तो अभिभावकों को कोई चिंता होगी और न ही बच्चों को अजीब लगेगा।''

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कब आएंगे 'अच्छे दिन'

हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लाए जाने वाले 'अच्छे दिनों' की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि सेहतमंद और निर्भीक समाज के लिए अच्छे दिनों पर बात कर रहे हैं। इस बारे में मिस नॉर्थ इंडिया प्रिंसेज की सभी दावेदारों की बेहद अलग-अलग राय है।

जहां, जैसमीन और गुरुषा अच्छे दिनों का मतलब जिम्मेदार तरीके से स्वतंत्र भारत को मानती हैं, वहीं अंकिता के लिए भ्रष्टाचार खत्म होने पर ही अच्छे दिन आएंगे।

शिमला की रहने वाले शैलजा और शिखा सुरक्षित और समानता से भरे समाज को अच्छे दिनों के रूप में देखती हैं जबकि नेहा तुरान प्रशासन तंत्र की लेट-लतीफी को दूर भगाकर अच्छे दिनों की चाहत रखती हैं। सोच सबकी अलग-अलग हो लेकिन चाहत वाकई अच्छे दिनों की है।
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