क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि नींद के दौरान आपने किसी को फोन पर मैसेज किया हो और सुबह उठकर कुछ याद ही न आए? अपने व्यवहार में आ रहे इस बदलाव पर अगर अब तक आपने गौर नहीं किया है तो अब इस गंभीरता से लें।
द अटलांटिक में प्रकाशित एक अध्ययन कि मानें तो नींद में चलने या बात करने की तरह नींद में मैसेज करना यानी 'स्लीप टेक्सटिंग' भी एक मानसिक रोग हो चुका है।
फोन के बहुत अधिक इस्तेमाल की वजह से कई बार मोबाइल की घंटी सुनाई पड़ना, वाइब्रेशन या चोरी होने जैसा आभास होना भी अपनेआप में एक मानसिक रोग है। इसके बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ डेटिंस्ट्री के प्रोफेसर माइकल गेल्ब ने अपने अध्ययन के आधार पर दावा किया है कि देर रात तक टेक्सटिंग या मैसेजिंग की वजह से कई बार आप नींद में हीं मैसेज करते हैं और जगने के बाद आपको कुछ याद ही नहीं रहता है। यह सोने और जगने के बीच की स्थिति होती है जिस वजह से आपको अपनी ही गतिविधि याद नहीं रह पाती है।
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शोधकर्ताओं का मानना है कि आमतौर पर यह स्थिति उन बहुत अधिक मैसेज करने वाले लोगों के साथ सोने के दो घंटे की भीतर होती है। इस दौरान नींद हल्की होती है जिसे हम रेपिड आइ मूवमेंट के नाम से भी जानते हैं। इस स्थिति पर नियंत्रण नहीं किया गया तो यह आगे चलकर याददाश्त व नींद संबंधी समस्याओं की बड़ी वजह हो सकता है।
हालांकि शोधकर्ताओं का यह भी मानना है कि काउंसिलिंग और दवाओं के जरिए भी इस समस्या का उपचार किया जा सकता है लेकिन बचाव सबसे अच्छा विकल्प है।
माइकल कहते हैं, ''ऐसी स्थिति के दौरान जरूरी है कि हम सोने से पहले फोन बंद करें, मैसेजिंग को नियंत्रित करें और समाजिक होने के लिए दूसरी गतिवधियों पर बल दें।''