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कान का मैल खोलता है सेहत का राज, जानें 5 फैक्ट्स

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कान का मैल कुछ उन शारीरिक पदार्थों में से एक है जिसकी चर्चा करना अमूमन हम पसंद नहीं करते हैं।
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शरीर के अन्य स्रावों की तरह, हम में से ज्यादातर अकेले में इससे निपटना पसंद करते हैं। तब भी कई लोगों के लिए यह एक आकर्षण का विषय है।

पहले इसका इस्तेमाल एक लिप बाम और ज़ख़्मों पर मरहम के तौर पर किया जाता था लेकिन यह इससे कुछ ज़्यादा कर सकता है। हाल के शोध से पता चलता है कि यह शरीर में प्रदूषक पदार्थ इकट्ठा होने का संकेत देता है और इससे शरीर में कुछ बीमारियों का भी पता लगाया जा सकता है।

कान के मैल से जुड़ी पाँच चीजें जो शायद आप ना जानते हो।

ये बाहर कैसे आता है?

कान के अंदर की कोशिकाएँ विशेष तरह की होती है। वे एक जगह से दूसरे जगह तक जाती है।

लंदन के रॉयल नेशनल अस्पताल में गला, नाक और कान के प्रोफेसर शकील सईद के मुताबिक़ " आप कान में स्याही की एक बूंद डाल कर देखिए, कुछ हफ़्तों के बाद पाएंगे कि कोशिकाओं के साथ ये बाहर आ रही है।"

यदि ऐसा नहीं होता है तो कान का छेद प्राकृतिक प्रक्रिया से बनी मृत कोशिकाओं से भर जाएगा।

इसी तरह से कान का मैल भी आगे बढ़ता है। ऐसा माना जाता है कि खाने-पीने के दौरान जबड़े के हिलने से भी ये मैल बाहर आता है।

प्रोफेसर सईद ने पाया है कि उम्र बढ़ने के साथ कभी-कभी यह मैल ज़्यादा काला हो जाता है और जिन लोगों के कान में बाल ज़्यादा होते हैं उनके कान से मैल बाहर नहीं आ पाता है।

एंटी-माइक्रोबियल गुण

कान के मैल में मोम होता है लेकिन यह मूल रूप से मृत केराटिनोसाइट्स कोशिकाओं का बना होता है।

कान का मैल कई पदार्थों का मिश्रण होता है। करीब 1,000 से 2,000 के बीच ग्रंथियां एंटी-माइक्रोबियल पेप्टाइड बनाती हैं। बालों की कोशिकाओं के करीब मौजूद वसा की ग्रंथियां मिश्रित एल्कोहल, स्कुआलीन नाम का तेल, कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड बनाती हैं।

महिलाओं और पुरूषों में कान का मैल एक समान मात्रा में बनता है लेकिन एक अध्ययन से पता चला है कि ट्राइग्लिसराइड की मात्रा नंवबर से जुलाई के बीच कम हो जाती है।

कान के मैल में लाइसोज़ाइम भी पाया जाता है जो एक एंटी-बैक्टिरियल एंज़ाइम है।

आपका परिवार कहां से है ये मायने रखता है

अमरीका के फिलाडेल्फिया के मोनेल संस्थान के वैज्ञानिकों के मुताब़िक एशियाई और गैर एशियाई लोगों के कान में अलग-अलग तरह का मैल होता है। क्रोमोज़ोम 16 कान के मैल के "गीले" या "सूखा" होने के लिए जिम्मेदार है।

जीन एबीसीसी11 में एक छोटा सा परिवर्तन कान के मैल के सूखा होने और चीनी, जापानी और कोरियाई व्यक्तियों के शरीर के कम दुर्गंध युक्त होने से संबंधित है।

अमरीकी अध्ययन में पूर्वी एशियाई और गोरे पुरुषों के समूहों में कान के मैल में 12 वाष्पशील कार्बनिक यौगिक पाए गए हैं।

साफ़ करने का तरीका

कान के मैल में एंटी-बैक्टीरियल एंजाइम लाइसोज़ाइम पाया जाता है।

कान को साफ़ करने के लिए किसी सिरींज के बदले नन्हा वैक्युम क्लीनर बेहतर है।

प्रोफेसर सईद सिरीज से बेहतर वैक्युम क्लीनर को मानते हुए कहते है, "अगर आप पानी का इस्तेमाल करते हैं तो उसे मैल से आगे जाना होगा और मैल लेकर वापस आना होगा। अगर कोई अंतर नहीं होगा तो ये मैल से आगे नहीं जा सकेगा और इस पर ज़्यादा ताकत भी नहीं लगाई जानी चाहिए। कान के पर्दे को सिरींज करने पर यूं तो नुकसान नहीं पहुंचता लेकिन ऐसा कभी-कभी होता है।"
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इससे प्रदूषण का पता चलता है

कान के मैल में कई अन्य शारीरिक स्राव की तरह कुछ भारी धातुओं के रूप में कुछ विषाक्त पदार्थ हो सकते हैं।

लेकिन एक तो यह ऐसी चीज़ देखने के लिए एक अजीब जगह है और दूसरी बात ये कि एक साधारण रक्त परीक्षण से ज़्यादा विश्वसनीय नहीं है।

कुछ दुर्लभ चयापचय संबंधी विकार कान के मैल को प्रभावित करने वाले होते हैं।
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