राज्य सरकारें एक बार फिर से उम्रकैद की सजा पाए कैदियों को सजा में छूट (रियायत) दे सकेंगी। हालांकि राज्यों को उन मामलों के दोषियों की सजा में छूट देने का अधिकार नहीं होगा जिनकी जांच सीबीआई ने की हो या फिर जिन लोगों को टाडा के तहत गिरफ्तार किया गया हो या फिर जिनमें कोर्ट ने छूट न देने का निर्देश दे रखा हो।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर एक साल पहले जारी किए गए स्थगनादेश को हटाते हुए कहा कि यह छूट उन कैदियों को नहीं मिलेगी जिन्हें बलात्कार और हत्या के आरोप में उम्रकैद मिली है।
कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने जुलाई 2014 के उस आदेश में फेरबदल किया है जिसमें राज्य को दोषियों को सजा में छूट या रियायत देने पर रोक लगा दी गई थी।
इन कैदियों पर लागू नहीं होगा यह फैसला
चीफ जस्टिस एच एल दत्तू की अगुवाई में पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया कि यह ‘अंतरिम आदेश’ राजीव गांधी हत्याकांड पर लागू नहीं होगा, जिसमें उम्र कैद की सजा पाए सात दोषियों को तमिलनाडु सरकार की ओर से रिहा किए जाने के अधिकार के खिलाफ केंद्र की याचिका विचाराधीन है।
केंद्र सरकार का कहना है कि राजीव गांधी हत्याकांड की जांच सीबीआई द्वारा की गई है, लिहाजा दोषियों को सजा में छूट देने का अधिकार केंद्र के पास है न कि राज्य सरकार के पास।
जस्टिस एफएमआई कलिफुल्ला, जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष, अभय मनोहर सप्रे और यूयू ललित वाली बेंच ने कहा कि उसका फैसला राजीव गांधी हत्याकांड के मामले में लागू नहीं होगा।
उसका अंतरिम आदेश उन मामलों पर लागू होगा, जिस पर फैसला सुनाया गया है। इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने 9 जुलाई 2014 को अपने उस आदेश को संशोधित किया है, जिसमें इसने राज्य सरकारों को उम्र कैद की सजा पाए कैदियों को छोड़ने के अधिकार पर रोक लगा दी थी।
यह मामला तमिलनाडु सरकार की ओर से राजीव गांधी हत्याकांड के तीन दोषियों - वी श्रीहरन उर्फ मुरुगन, संथन और अरिवु को छोड़ देने के फैसले के बाद उठा था। मृत्युदंड पाए इन अभियुक्तों की सजा उम्र कैद में बदल दी गई थी।