छोटे शहरों, कस्बों और गांवों से निकलकर आ रहीं कामकाजी महिलाओं की पहली पीढ़ी के रहने का ठिकाना बनाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ी पहल करने का फैसला कर लिया है। इसके तहत कामकाजी महिलाओं की बढ़ती तादाद को देखते हुए पहली दफा देश के प्रत्येक जिले में कम से कम एक वर्किंग वुमन हॉस्टल बनाने का निर्णय लिया गया है। इस हॉस्टल में ऐसी महिलाओं को रहने का मौका मिलेगा, जिनके परिवार के सदस्य उस इलाके में नहीं रहते हैं।
महिला एवं बाल विकास सचिव प्रेम नारायण ने बताया कि लंबे समय से राज्यों की ओर से इसकी मांग की जा रही थी। इस मांग पर अब मंत्रालय ने हामी भर दी है। उन्होंने कहा कि महानगरों ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों में भी महिलाएं बड़ी तादाद में काम कर रही हैं। पिछले छह साल में देश में कामकाजी महिलाओं की संख्या करीब 50 फीसदी तक बढ़ी है। इसलिए सरकार ने कामकाजी महिलाओं के सुरक्षित और बिना किसी समस्या के देश के किसी भी जिले में कामकाज के लिए प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया है। इस हॉस्टल में तलाकशुदा, विधवा या अकेली रहने को मजबूर लड़कियां भी सुरक्षित रह सकेंगी।
केंद्र की इस प्रस्तावित योजना के तहत सरकारी जमीन पर वर्किंग हॉस्टल के निर्माण के लिए वित्तीय सहायता दी जाएगी। इसके अलावा किराए पर चलने वाले वर्किंग हॉस्टल को भी मंत्रालय की इस योजना का वित्तीय लाभ मिल सकेगा। हालांकि इसका खाका अभी मंत्रालय ने तैयार नहीं किया है। माना जा रहा है कि वर्किंग वुमन हॉस्टल में रहने की पहली प्राथमिकता ऐसी महिलाओं को मिलेगी जिनकी कुल आय महानगरों में 30 हजार रुपये प्रति माह और अन्य शहरों में 25 हजार रुपये प्रति माह से ज्यादा नहीं हो।
क्रिच सेवा का भी होगा विस्तार
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने कामकाजी महिलाओं के बच्चों की देखरेख के लिए क्रिच सेवा के विस्तार का निर्णय भी लिया है। फिलहाल देश में दो लाख अतिरिक्त क्रिच सेवा की मांग है। मंत्रालय के सचिव ने बताया कि इस मांग को पूरा करने के लिए आंगनबाड़ी सेंटरों से मदद ली जाएगी। देश में करीब एक लाख नए आंगनबाड़ी सेंटरों का निर्माण भी किया जाएगा।
'अक्सर अकेली रहने वाली लड़कियों को समाज के तमाम सवालों और संकीर्ण सोच का सामना करना पड़ता है। कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा और उनकी कार्य क्षमता बढ़ाने में ऐसे निर्णय काफी कारगर होंगे। हालांकि मंत्रालय को यह ध्यान भी रखना होगा कि हॉस्टल जेल में तब्दील न हो। महिलाओं के हॉस्टल में आने-जाने के समय पर पाबंदी नहीं लगाई जानी चाहिए और उन्हें रियायती कीमत पर यह सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए।'
- वृंदा ग्रोवर, सुप्रीम कोर्ट की वकील