गुवाहाटी से चेन्नई, और दिल्ली से कोलकाता तक, हर कोई प्रशांत किशोर को अपने पाले में लाना चाहता है। 2014 में आम चुनावों के दौरान मोदी के चुनाव प्रचार अभियान की कमान थामने वाले प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार को तीसरा कार्यकाल हासिल करने में काफी अहम भूमिका निभाई है।
अब प्रशांत किशोर को पूरे देश से उन पार्टियों के ऑफर मिलने लगे हैं जो मोदी रथ को रोकना चाहते हैं। दिल्ली और सभी राज्यों की राजधानी में दूसरे पायदान के नेता डर गए हैं कि अगर किशोर चुनावी रंगमंच पर आते हैं तो उनकी सत्ता छिन सकती है।
किशोर पटना में हैं और अभी भी कैबिनेट बनाए जाने के बारे में बातचीत करने के लिए रोज ही मुख्यमंत्री आवास से लालू यादव के घर दो बार जाते हैं। नीतीश की तरफ से उन्हें एक ‘बडा ऑफर’ दिया जा चुका है। शायद राज्य सभा सीट? या बिहार में महत्वपूर्ण मंत्री पद?
किशोर ने स्वीकार नहीं किया दरियादिल ऑफर
किशोर ने इस दरियादिल ऑफर को स्वीकार नहीं किया है। इसकी कीमत 2019 में बिहार की 40 सीटों पर महागठबंधन को जिताने में मदद देने के रूप में होती। सत्ता हासिल करना, 37 साल के प्रशांत किशोर की महत्वाकांक्षाओं में शुमार नहीं है।
उनकी सेवाओं की कीमत सार्वजनिक नहीं है, लेकिन अगर उन्हें पैसा ही चाहिए होता तो ये सारे ऑफर वे स्वीकार कर लेते और अपनी संस्था ‘इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी’ को पूरे देश में फैलाते।
किशोर बस इतना चाहते हैं कि वे राजनीतिक सलाहकार बने रहें और अपने क्लाइंट को जिताएं। वो मोदी सरकार और भाजपा के साथ बने रहना चाहते थे, लेकिन पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने मोदी को ये साफ बता दिया था कि वो उन्हें साथ नहीं रखेगा।
श्रेय लेने की लड़ाई भी है एक वजह
दरअसल इसके पीछे श्रेय लेने की लड़ाई एक वजह मानी जा रही है। 2014 की जीत का पूरा श्रेय अमित शाह और आरएसएस को मिला, लेकिन किशोर और उनकी टीम को लगा कि उन्हें वो नहीं मिला जिसके वो हकदार थे।
किशोर के बिहार के मैदान में कूदने के पीछे अमित शाह को सबक सिखाने की सोच भी शामिल थी। वो आदमी जो मोदी के साथ उनके गांधीनगर के घर में तीन सालों तक रहा, वो अब नीतीश कुमार के घर, 7 सर्कुलर रोड, पटना में रह रहा है।
राजनीतिक सलाहकार के रूप में किशोर का पहला चुनाव 2012 का गुजरात विधानसभा चुनाव था और बिहार का चुनाव तीसरा था। मोदी के साथ काम करते हुए रणनीति बनाने में हासिल किए अनुभवों को इस्तेमाल कर, किशोर की आईपीएसी टीम बिहार में एक कदम आगे गई।
इस टीम ने चुनावी क्षेत्र के स्तर पर छोटे से छोटे मामलों पर नजर रखी और बीजेपी की 'हवा' बनाने के लिए आरएसएस जितना करती है, उससे ज्यादा किया।
क्लाइंट चुनने के लिए किशोर के हैं तीन पैमाने
किशोर को श्रेय देने के मामले में नीतीश और लालू ने काफी दरियादिली दिखाई। आठ नवंबर को जब बिहार चुनावों के नतीजे आए तो लालू ने सार्वजनिक रूप से उन्हें ‘बुद्धिजीवी’ बताया और नीतीश कुमार ने उन्हें प्रेस के सामने आने का न्योता दिया।
यह अकेली घटना ही ये बता देती है कि नीतीश कुमार के पक्ष में हवा बदलने में किशोर कितने अहम थे। किशोर ने सुनिश्चित किया कि लालू और नीतीश के बीच का गठबंधन जमीनी स्तर पर भी बहुत सहज रहे और मतदाताओं की जबान पर महागठबंधन इस तरह चढ़े कि लगे कि यह कोई अकेली पार्टी है।
आईपीएसी टीम के कुशल सर्वेयर महागठबंधन के सभी उम्मीदवारों को रोजाना ही उनके बारे में स्वतंत्र फीडबैक देते थे। एनडीए को पछाड़ने के लिए महागठबंधन के प्रचार अभियान की हर दूसरे दिन रणनीति तैयार की जाती थी।
ऐसा पता चला है कि अगला क्लाइंट चुनने के लिए किशोर ने तीन पैमाने बनाए हैं। पहला, जहां भी जाएं, उनका काम उनके मिशन 2019 से जुड़े, वो ऐसी पार्टी या गठबंधन के साथ जाना चाहते हैं जिसके जीतने की संभावना अधिक हो।
लक्ष्य के साथ बची है सिर्फ कांग्रेस
इस लक्ष्य के साथ तो बस एक पार्टी बचती है और वो है कांग्रेस। चूंकि 2019 के भारत का रास्ता 2017 के उत्तर प्रदेश के चुनाव से होकर जाता है, इसलिए सूत्र कहते हैं कि किशोर की नजर इस राज्य पर गड़ी है जिसे भारतीय राजनीति में सबसे अहम माना जाता रहा है।
किशोर का दूसरा पैमाना ये है कि जिस नेता के साथ वो काम करें उसकी कुछ साख हो। अगर मोदी से जुड़े 2002 के मामले छोड़ दें तो गुजरात में उनकी छवि एक बेहतरीन प्रशासक की रही है जो प्लस प्वाइंट थी।
अगर नीतीश कुमार 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद उबर पाए हैं तो इसलिए कि उनसे बिहार को अंधेरे से बाहर लाने के श्रेय की व्यापक धारणा जुड़ी हुई थी। इस पैमाने से आंका जाए तो किशोर को उन नेताओं में कुछ भी अलग नहीं दिख सकता है जो उनका फिलहाल गुणगान कर रहे हैं।
राहुल गांधी की कोई खास साख नहीं है, तरुण गोगोई बहुत बूढ़े हो चुके हैं, पश्चिम बंगाल के विकास में ममता बनर्जी ने कुछ खास किया हो, ऐसा नहीं दिखता और तमिलनाडु में डीएमके बेहतर प्रशासन का दावा नहीं कर सकती।
कांग्रेस कर रही है प्रशांत का गुणगान
किशोर का तीसरा पैमाना है, शीर्ष नेता के साथ उनकी ऐसी करीबी हो जैसी उस पार्टी के किसी नेता की भी न हो। इसीलिए किशोर शीर्ष नेता के साथ ही रहते हैं। यह पैमाना बीजेपी या कांग्रेस के मुकाबले जेडीयू जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के लिए आसान है।
चूंकि कांग्रेस हताश है और प्रशांत का बहुत ज्यादा गुणगान कर रही है, फिर भी इस तरह की पहुंच और निर्विवाद अहमियत देना, धड़ों में बंटी कांग्रेस के लिए बहुत मुश्किल है।
किशोर का कहना है कि उनका किसी विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन कौन जानता है कि मोदी अपने पाले में लाने के लिए उन्हें दोबारा नहीं रिझाएंगे?
चाहे अमित शाह साथ हों या नहीं, मोदी के लिए इसकी बहुत कम ही संभावना है, क्योंकि किशोर पहले ही लक्ष्मण रेखा पार कर चुके हैं।