राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी घोषणा के बहाने मुफ्त साइकिल, लैपटॉप, साड़ी तथा दाल-चावल बांटने का वादा करके मतदाताओं को रिझाने के दिन जल्द ही हवा होने वाले हैं।
सुप्रीम कोर्ट के पिछले हफ्ते के निर्देश पर अमल करते हुए चुनाव आयोग राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र के लिए नए दिशा निर्देश तैयार कर रहा है।
इसके तहत मतदाताओं को रिझाने के लिए इस तरह की घोषणाओं पर रोक लग सकती है। आयोग जल्द ही एक बैठक बुलाकर राजनीतिक दलों से भी दिशा निर्देश के संबंध में राय लेगा।
तमिलनाडु में जयललिता सरकार द्वारा चुनावी घोषणा के आधार पर लोगों को मुफ्त उपहार देने के मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों की ओर से जारी घोषणा पत्रों में लुभावने वादे किए जाने को को गलत बताया था।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि वह राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्रों के संबंध में ऐसे दिशा निर्देश बनाए जिससे भविष्य में इस तरह की घोषणाओं से बचा जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अमल करते हुए आयोग ने घोषणा पत्र के लिए नए दिशा निर्देश तैयार करने का काम शुरू कर दिया है। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश और इसकी पृष्ठभूमि की कापियां सभी राजनीतिक दलों को भेज दी हैं ताकि वे मामले को समझ सकें।
चुनाव आयोग अपने स्तर से दुनियाभर के लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र संबंधी जानकारियां भी जुटा रहा है। घोषणा पत्र को लेकर विभिन्न संस्थाओं तथा नेताओं के विचारों को भी आयोग जुटाने का प्रयत्न कर रहा है।
सूत्रों के अनुसार अगले हफ्ते राजनीतिक दलों के साथ आयोग की बैठक हो सकती है। नवंबर-दिसंबर में पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव और अगले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए आयोग घोषणा पत्रों में लुभावने वादों पर रोक के लिए दिशा निर्देश तैयार कर लेना चाहता है।
क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने
भले ही चुनाव घोषणा पत्र में किए गए वादों को जनप्रतिनिधित्व (आरपी) अधिनियम की धारा 123 के तहत भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इससे हर कोई प्रभावित होता है। ऐसे वादों से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की बुनियाद हिल जाती है। दलों की यह कारगुजारी चुनावी प्रक्रिया को दूषित करती है।