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क्या मेधा को सोशल इंजीनियरिंग दिला पाएगा जीत?

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नर्मदा घाटी की आवाज बनकर उभरीं समाजसेवी मेधा पाटकर अब सियासत की दुनिया में आ धमकी हैं। मेधा पाटकर उत्तर-पूर्व मुंबई लोकसभा सीट से आम आदमी पार्टी के टिकट से चुनाव मैदान में हैं।
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उनका चुनाव में उतरना राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के लिए झटका, जबकि भाजपा के लिए वॉकओवर माना जा रहा है। यहां वह सोशल इंजीनियरिंग के सहारे मैदान मारने की जुगत में हैं।

हालांकि उनके लिए संसद की राह आसान नहीं है। उत्तर-पूर्व मुंबई में मानखुर्द-गोवंडी-शिवाजी नगर इलाका झुग्गी-झोपड़ी बाहुल्य है, यहां मेधा पाटकर का जनाधार माना जा रहा है, लेकिन उसके बाहर इस संसदीय क्षेत्र की अन्य पांच विधानसभा सीटों में उनकी तूती बोलेगी ऐसा नहीं लगता।
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सभी का है अपना दावा

इस वोट बैंक पर शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से लेकर समाजवादी पार्टी का भी अपना दावा है। पिछले लोकसभा चुनाव में सपा मैदान में नहीं थी और मनसे ने भाजपा का खेल बिगाड़ दिया था।

पांच विधानसभाओं में लीड हासिल करने के बावजूद गोवंडी और मानखुर्द-शिवाजी नगर की दलित व मुस्लिम जनता ने किरीट सोमैया के जीत का सपना चकनाचूर कर दिया था।

वर्तमान में जिस वोट बैंक के सहारे मेधा संसद का सफर तय करना चाहती हैं उसी के बल पर सन 2009 के चुनाव में राकांपा के संजय पाटिल ने महज 2933 मतों के अंतर से भाजपा के किरीट सोमैया को पटखनी दी थी।

सपा ने भी चली है चाल

इस बार सपा ने भी रईश शेख के रूप में मुस्लिम चेहरा मैदान में उतारा है। इसलिए मुस्लिम मतों का भी बंटवारा तय है। यहां मुलुंड, घाटकोपर पूर्व और पश्चिम का इलाका गुजराती बाहुल्य माना जाता है, जो भाजपा का वोट बैंक रहा है।

अन्य विधानसभाओं विक्रोली, भांडुप में मनसे का बोलबाला है। यहां मध्यम वर्ग और मराठी भाषी मतदाताओं की काफी संख्या है। इस बार राज ठाकरे की मनसे का प्रत्याशी नहीं है।

मेधा पाटकर इस वोट बैंक का विकल्प हो सकती हैं। ऐसा होने पर मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है। मुंबई के मराठी भाषी बड़ी संख्या में या तो शिवसेना के साथ हैं या फिर मनसे के साथ।

मेधा का असर विपक्षियों को घातक

यहां भाजपा-शिवसेना का गठबंधन है और उत्तर-पूर्व मुंबई में मनसे का प्रत्याशी भी नहीं है। ऐसे में उनका झुकाव भाजपा की ओर होना लाजिमी है। मतदाताओं पर मेधा की सोशल इंजीनियरिंग का जितना असर होगा उतना ही भाजपा और एनसीपी की चुनावी राह कठिन होगी।

फिलहाल, ऐसा नहीं दिखाई देता, लेकिन लोगों में उनकी समाज सेवा की धमक जरूर है। मेधा के लिए सबसे बड़ा संकट उनका कमजोर संगठन है।

उत्तर-पूर्व मुंबई में आप का ऐसा कोई संगठन नजर नहीं आता जो मेधा पाटकर के सोशल इंजीयिरिंग से प्रभावित मतदाताओं को बूथ तक पहुंचा सके।
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कार्यकर्ताओं को नहीं चुनावी तिकड़म का ज्ञान

कहने को तो आप के हजारों स्वयंसेवक हैं, लेकिन उन्हें चुनावी तिकड़म का ज्ञान नहीं है। वहीं, मुकाबले में भाजपा और एनसीपी बीस दिख रही हैं।

उत्तर-पूर्व मुंबई यूं तो सन 1967 तक कांग्रेस का गढ़ रहा है, लेकिन उसके बाद परिस्थिति कांग्रेस के हाथ नहीं रही।

सन 1977 और 1980 में जनता पार्टी के सुब्रमण्यम स्वामी यहां से जीते। लेकिन उसके बाद से कोई भी प्रत्याशी यहां से लगातार दो बार चुनाव नहीं जीत पाया है।
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