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क्या नेपाल फिर कभी हिंदू राष्ट्र बन पाएगा?

Thu, 27 Nov 2014 05:07 PM IST
विनीत खरे/बीबीसी संवाददाता, नेपाल
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भारत में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद क्या पड़ोसी देश नेपाल में देश को दोबारा हिंदू राष्ट्र घोषित किए जाने की मांग को बल मिलेगा? ढाई करोड़ से ज़्यादा की जनसंख्या वाले नेपाल को 2006 में धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित कर दिया गया था।
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लेकिन लंबे समय से जारी राजनीतिक संकट और इसाई संस्थाओं द्वारा कथित धर्मपरिवर्तन के आरोपों के बीच नेपाल को फिर हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग जोर पकड़ रही है।

इस मांग के समर्थन में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी नेपाल ने हस्ताक्षर अभियान चलाया हुआ है। पार्टी का दावा है कि पिछले एक महीने में उसने 20 लाख से ज़्यादा हस्ताक्षर इकट्ठा किए हैं।
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पार्टी की काठमांडू जिला इकाई के अध्यक्ष नवराज सिंह खड़का कहते हैं, "दुनिया भर में नेपाल एकमात्र हिंदू राष्ट्र था। ये नेपाल और नेपाली दोनों की पहचान है। हम दुनिया भर के एक अरब 25 करोड़ हिंदुओं की पहचान के लिए लड़ रहे हैं।"

नेपाल में 80 प्रतिशत से ज्यादा लोग हिंदू हैं। राजनीतिक गतिरोध और धर्म परिवर्तन के आरोपों के कारण लोगों में निराशा है, लेकिन भारत में नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने से हिंदू राष्ट्र समर्थकों में उत्साह है।

नेपाली जनता और हिंदुत्व

माधव भट्टाराई विभिन्न हिंदू दलों का नेतृत्व कर रहे हैं। वह कहते हैं, "हिंदुत्व का एजेंडा होने से हमें उनसे (नरेंद्र मोदी) नैतिक बल मिला है। जो सरकार, जिसके बारे में हमें लगता था कि वो हिंदू विरोधी थी और किसी भी आंदोलन को दबाने का काम करती थी, वो अब हट गई है। इससे भी हमें ताकत मिली है।"

लेकिन माधव भट्टाराई ये भी कहते हैं कि आखिरी फैसला नेपाली जनता को करना है।

नेपाल में सभाओं, आयोजनों की मदद से लोगों को हिंदू राष्ट्र की मांग से जोड़ने की कोशिश हो रही है, लेकिन जानकारों के मुताबिक जब तक इस मांग का राजनीतिक दल और नेपाल के आम लोग खुलकर समर्थन नहीं करते तब तक इस मांग का पूरा होना आसान नहीं है।

प्रस्ताव के आलोचक कहते हैं कि हिंदू देश की मांग कुछ नहीं बल्कि राजशाही की कोशिश है कि वो नेपाल की राजनीति में पिछले दरवाज़े से एंट्री करे। उनके मुताबिक नेपाल के सेक्युलर, गणतंत्र बनने के बाद दलित और पिछड़े वर्गों को अपनी बात कहने का मौका मिला है जो राजशाही के जमाने में संभव नहीं थी।

नेपाली कांग्रेस नेता अमरेश कुमार सिंह कहते हैं कि शुरुआत से ही राजशाही ने नेपाल में हिंदू धर्म का दुरुपयोग किया है।

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़े अमरेश कुमार सिंह कहते हैं, "जिस संविधान सभा का मैं सदस्य हूं, वहां मुझे नहीं लगता कि संविधान में नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाए जाने की बात शामिल की जाएगी। कोई भी राजनीतिक दल इसके लिए तैयार नहीं है।"
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नेपाल की समस्या

अमरेश कहते हैं, "यहां की जनजाति अपने आपको हिंदू नहीं मानती। यहां के आदिवासी (खुद को) हिंदू नहीं मानते। दलित कहते हैं कि हिंदू वर्ण व्यवस्था के कारण वो मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाए।"

उधर, वरिष्ठ पत्रकार युबराज घिमिरे कहते हैं कि नेपाल में समस्या ये रही कि उसे सेक्युलर घोषित किए जाने के बाद राज्य और धर्म के रिश्तों की परिकल्पना नहीं की गई। वह इस मांग के लिए राजशाही की कथित बैकडोर एंट्री के आरोपों से भी इनकार करते हैं।

वह कहते हैं, "दुनिया में कहीं ऐसा नहीं हुआ कि राजा अपदस्थ होने के बाद उसी देश में रहा हो। राजा ने ऐलान किया था कि लोग उन्हें जिस अवस्था में रखेंगे, वो उसी हालत में रहेंगे। वह मंदिर दर्शन करने गए हैं, लेकिन उन्होंने हिंदू संगठन या राजनीतिक दल से जुड़ाव नहीं रखा है।"

घिमिरे का मानना है, "संविधान नहीं बनना राजा के कारण नहीं हुआ। राजनीतिक दलों के काम करने के अंदाज़ और व्यवहार के कारण राजा लोकप्रिय हुए हैं।"

नेपाल के लोगों के जीवन में आस्था का बहुत महत्व है। बहस इस बात पर है कि क्या इस आस्था को नेपाल के भविष्य का आधार बनाया जाए? ये फ़ैसला आखिरकार नेपाल के लोगों को ही करना है।
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