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क्या सरकार में रहकर BJP से लड़ेगी शिवसेना?

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एक महीने की उठापठक के बाद शिवसेना ने अचानक यू टर्न ले लिया और भाजपा को अफजल खान की सेना बताने वाली पार्टी के सामने घुटने टेक दिए।
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शिवसेना अध्यक्ष ने अपनी शर्तों पर नहीं बल्कि भाजपा की शर्तों पर आत्मसमर्पण किया हैं। उद्धव ठाकरे पर विधायकों का भारी दबाव था, जिसके चलते उन्हें सरकार में शामिल होने का निर्णय लेना पड़ा। लेकिन कहा जा रहा है कि उद्धव ने हार नहीं मानी है।

शिवसेना ने सरकार में रहकर भाजपा के खिलाफ लड़ने की रणनीति बनाई है। वक्त आने पर शिवसेना वही दांव खेलेगी जो भाजपा ने उसके साथ खेला है।

भाजपा सरकार में शामिल होने के मुद्दे पर शिवसेना में दो गुट बन गए थे। जमीनी तौर पर शिवसैनिक नहीं चाहते थे कि शिवसेना सरकार में शामिल हो लेकिन विधायक सरकार का हिस्सा बनना चाहते थे। यदि छह महीने के अंदर भाजपा के साथ समझौता नहीं होता तो शिवसेना के कई विधायक टूटकर भाजपा में शामिल हो सकते थे।
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विधायकों के दबाव में उद्धव ने टेके घुटने

ऐसे में शिवसेना लड़खड़ा जाती और उद्धव का राजनैतिक साम्राज्य ढहने की कगार पर पहुंच जाता। वैसे भी शिवसेना मौजूदा समय में भाजपा से लड़ने की हैसियत में नहीं है, इसलिए उद्धव को भाजपा का ऑफर स्वीकार करना पड़ा।

उधर, भाजपा पर भी आरएसएस का भारी दबाव था। दरअसल, 14 नवंबर को जब मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने विधानसभा में ध्वनिमत से विश्वासमत हासिल किया तब यह संदेश गया कि बीजेपी ने सत्ता की खातिर एनसीपी से हाथ मिला लिया है।

एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार हमेशा आरएसएस की खिलाफत करते रहे हैं। परोक्ष तौर पर ही सही लेकिन एनसीपी के साथ तालमेल से संघ खुश नहीं था। समझा जा रहा है कि संघ के हस्तक्षेप के बाद शिवसेना से गंभीरतापूर्वक बातचीत शुरू हुई।

उधर, भाजपा ने शिवसेना को सरकार में शामिल करने के लिए राजी कर एक तीर से दो निशाने साधे है। उसने एक तरफ शिवसेना का गुरूर तोड़ा और दूसरी तरफ अल्पमत में चल रही फडणवीस सरकार को मजबूती दिलाई है। इस तरह शह और मात के खेल में बीजेपी ने बाजी मार ली है और शिवसेना अपने ही जाल में फंसकर रह गई है।
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