एक महीने की उठापठक के बाद शिवसेना ने अचानक यू टर्न ले लिया और भाजपा को अफजल खान की सेना बताने वाली पार्टी के सामने घुटने टेक दिए।
शिवसेना अध्यक्ष ने अपनी शर्तों पर नहीं बल्कि भाजपा की शर्तों पर आत्मसमर्पण किया हैं। उद्धव ठाकरे पर विधायकों का भारी दबाव था, जिसके चलते उन्हें सरकार में शामिल होने का निर्णय लेना पड़ा। लेकिन कहा जा रहा है कि उद्धव ने हार नहीं मानी है।
शिवसेना ने सरकार में रहकर भाजपा के खिलाफ लड़ने की रणनीति बनाई है। वक्त आने पर शिवसेना वही दांव खेलेगी जो भाजपा ने उसके साथ खेला है।
भाजपा सरकार में शामिल होने के मुद्दे पर शिवसेना में दो गुट बन गए थे। जमीनी तौर पर शिवसैनिक नहीं चाहते थे कि शिवसेना सरकार में शामिल हो लेकिन विधायक सरकार का हिस्सा बनना चाहते थे। यदि छह महीने के अंदर भाजपा के साथ समझौता नहीं होता तो शिवसेना के कई विधायक टूटकर भाजपा में शामिल हो सकते थे।