आलीशान होटलों में डांस की अनुमति और बार डांसरों पर प्रतिबंध, सरकार इस तरह का दोहरा मापदंड कैसे अपना सकती है। यदि प्रतिबंध लगाना है तो सब पर लगाएं, कानून की नजर में सब बराबर हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने बार बालाओं की गुहार पर महाराष्ट्र सरकार को नसीहत देते हुए यह टिप्पणी की है। सर्वोच्च अदालत ने बार क्लबों में हिंदी (बॉलीवुड) गाने बजाने पर सवाल उठाने पर भी राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई।
चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष बार मालिकों और बार गर्ल्स की ओर से पेश हुए अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि राज्य सरकार की ओर से लगाया गया प्रतिबंध समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
बार गर्ल्स के जीवकोपार्जन के अधिकार का उल्लंघन है। हजारों की तादाद में बार गर्ल्स बेरोजगार हो गई हैं। उनकी जीविका से उनके परिवार का गुजारा चलता था।
अधिवक्ता ने दलील दी कि बार में डांस की अनुमति के लिए लाइसेंस का प्रावधान था। लेकिन अचानक सिर्फ बार क्लबों में डांस पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जबकि होटलों को अनुमति प्रदान की जा रही है। इस पर पीठ ने राज्य सरकार के अधिवक्ता से उनका पक्ष पूछा।
राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता शेखर नफाड़े ने कहा कि थ्री स्टार या उससे ऊपर के होटलों में डांस की अनुमति देने का प्रावधान है। बार क्लबों में डांस पर प्रतिबंध लगाने की वजह गैरकानूनी गतिविधियां थीं। ये बार क्लब सभी बदमाशों और गैरकानूनी काम करने वालों के अड्डे बन गए थे।
राज्य सरकार तीन-चार हजार डांस बार में पुलिस नहीं लगा सकती। इस पर पीठ ने कहा कि इस तरह के दोहरे मापदंड क्यों अपनाए हैं। यदि पुलिस नहीं लगा सकते तो पूरी तरह से प्रतिबंध क्यों नहीं लगा देते।
कानून की नजर में सब बराबर हैं। राज्य के अधिवक्ता ने आगे कहा कि बार में बॉलीवुड के गानों पर अश्लील डांस होता है, कोई नियंत्रण नहीं है।
पीठ ने राज्य सरकार के इस तर्क पर नाराजगी जताते हुए कहा कि बार में हिंदी गाने नहीं बजेंगे तो क्या ओपरा बजेगा। सवाल ये है कि इस मामले में राज्य सरकार ने समान व्यवहार नहीं किया। अदालत ने इस मामले में अपना आदेश सुरक्षित कर लिया है।
गौरतलब है कि बार मालिकों की दलील है कि यदि किसी क्लब में राज्य सरकार को गैरकानूनी गतिविधि का अंदेशा है तो उसके खिलाफ कार्रवाई करे। लेकिन यदि क्लब पर प्रतिबंध लगा रहें है तो फिर होटलों पर भी लगाएं।