लोकसभा चुनाव से पहले दिल्ली के शाही इमाम ने अपने तेवर तल्ख कर लिए हैं। ऐसे में अब सैय्यद अहमद बुखारी के तेवर पर एमएलसी उमर अली का भविष्य भी सपा में टिका हुआ है।
चुनावी सीजन के नाजुक दौर में शाही इमाम ने सपा से दूरी बढ़ाने के संकेत और कांग्रेस-बसपा पर डोरे डालने वाले बयान से सियासी गलियारे को गर्म कर दिया है। हालांकि अब सबकी निगाहें अहमद बुखारी के सियासी कदमों पर टिकी है।
मुलायम ने खेले सारे दांव
दरअसल, लोकसभा चुनाव में मुसलमानों को अपने पाले में रोकने के लिए सत्ताधारी पार्टी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। यही कारण है कि मुजफ्फरनगर दंगों के बाद रेवड़ियों की तरह लालबत्ती भी बांटी गईं।
सत्तासीन पार्टी को झटका देते हुए उन्होंने सपा को धोखेबाज पार्टी बताया और कांग्रेस-बसपा को वोट देने की नसीहत दी है। इन बयानों के बाद उनके दामाद और एमएलसी के राजनीतिक भविष्य में भी उठापटक की संभावना व्यक्त होने लगी है।
आपसी लड़ाई ने बढ़ाई दूरी
विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे में सपा में रार हुई। काजी रशीद मसूद ने उमर के टिकट के विरोध में पार्टी छोड़ी।
इमाम बुखारी के दामाद को बेहट से मैदान में उतारा गया, मगर उन्हें करारी शिकस्त मिली। सरकार बनने के बाद इमाम बुखारी ने अपने तेवर तल्ख किए तो सपा ने उमर को एमएलसी बना दिया।
बसपा की ओर इमाम का पासा
लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस और बसपा से नजदीकियों के संकेत से उन्होंने सपा की धड़कनें बढ़ा दी है। हालांकि पार्टी के लोग इमाम के तल्ख तेवर के मायने तलाश रहे हैं।
यह भी चर्चा है कि एमएलसी को इन तेवरों से नफा-नुकसान दोनों हो सकता है। मगर, अब बुखारी के अगले कदम पर ही एमएलसी का राजनीतिक भविष्य तय होगा।