फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

प्रमोशन में आरक्षणः फायदा किसे, विरोध क्यों

Mon, 17 Dec 2012 10:26 PM IST
चंदन जायसवाल/नई दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन
आरक्षण एक ऐसा शब्द है जिसने देश की राजनीति में कई बार तूफान मचाया है। एक बार फिर इसी आरक्षण ने संसद में हंगामा मचा रखा है। संसद में पेश 'प्रमोशन में आरक्षण' बिल के लिए यूपी के दो प्रमुख राजनीतिक दलों सपा और बसपा में द्वंद्व जारी है।
विज्ञापन

 
क्या है प्रमोशन में आरक्षण?
प्रमोशन में आरक्षण बिल के मुताबिक दलितों और आदिवासियों को सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण का प्रावधान है। इस बिल को 1995 से ही लागू किए जाने का प्रावधान है।
 
यूपी में तत्कालिन मुख्यमंत्री मायावती ने अपने कार्यकाल के दौरान प्रमोशन में एससी-एसटी को आरक्षण देने का फैसला लागू करवाया था, लेकिन पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे किसी आरक्षण के प्रावधान पर आपत्ति जताते हुए इसे खारिज कर दिया था।
विज्ञापन

 
दरअसल 1955 से 1995 तक आरक्षण मिलता रहा था, मगर उसके लिए कोई सांवैधानिक प्रावधान नहीं था। लिहाजा सरकार ने इसे अनिवार्य बनाने के लिए इसमें कुछ संशोधन किए, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे 2002 में खारिज कर दिया था।
 
बाद में अप्रैल 2012 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रमोशन में आरक्षण से पहले ये तय करना
होगा कि पिछड़ेपन, योग्यता और उचित प्रतिनिधित्व के आधार पर वाकई किसी को दिया जा रहा आरक्षण जरूरी और संवैधानिक तौर पर सही है।
 
इसी आधार पर मायावती लगातार सरकार पर इस प्रावधान को पूरी तरह से हटाते हुए संशोधन के साथ बिल को फिर से पास कराने का दबाव बना रही है।

अगर यह बिल पास हो जाता है तो दलितों व आदिवासियों को प्रमोशन और वरीयता नए कानून के मुताबिक दी जाएगी। बसपा का अस्तित्व दलितों पर टिका है।
 
जहां बसपा इस विधेयक को पारित कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है, वहीं समाजवादी पार्टी इसका विरोध करके न केवल अन्य पिछड़ी जातियों पर अपनी पकड़ मजबूत रखना चाहती है बल्कि अगड़ी जातियों में भी घुसपैठ करना चाहती हैं।
 
पिछड़ों और मुसलमानों के समर्थन से मायावती को विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त देने वाले मुलायम सिंह यादव यूपी में अगड़ी जाति के साथ-साथ लाखों सरकारी कर्मचारियों का भी विश्वास जीतना चाहते हैं। यदि अगड़ों का साथ मिल गया तो लोकसभा चुनावों में भी मुलायम नंबर वन ही रहेंगे।
 
रही बात सरकार की तो वह मायावती के साथ दिख तो रही है लेकिन उसकी अहम सहयोगी डीएमके इस बिल के विरोध में है। एनडीए की बात करें तो इस बिल पर उसमें भी एक राय नहीं है। बीजेपी का रुख जहां साफ नहीं है वहीं जेडीयू इस बिल के पक्ष में है, जबकि शिवसेना खिलाफ है।
 
इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि इस कानून को सभी राज्यों को अनिवार्य रूप से मानना होगा। सरकार की मुश्किल ये भी है कि इस विधेयक को पास कराने के लिए उसे दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी यानि संसद के दोनों सदनों में इस इस विधेयक को पास कराने के लिए मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा का साथ भी उसे चाहिए होगा।

बहरहाल, नौकरी में कर्मठ, मेहनती और ईमानदारी जैसे गुणों के साथ काम करने वाले कर्मचारियों का यह नैसर्गिक अधिकार है कि उन्हें अपने काम के बदले सही वक्त पर सही रूप में पदोन्नति मिले?
विज्ञापन


क्या प्रोन्नति में आरक्षण जायज है?
 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें