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आखिर क्यों दूर नहीं हो पा रही मुलायम की चिंता?

Sat, 29 Sep 2012 10:19 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/लखनऊ
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‘जनता ने मेरे कहने पर भरोसा करके समाजवादी पार्टी की पूर्ण बहुमत से सरकार बना दी है। अब उसके विश्वास पर हमें खरा उतरना है। पिछली सरकार से कामकाज में अंतर तो आया है, फिर भी अभी और तेजी से काम अपेक्षित है। कार्यकर्ताओं का सम्मान बना रहेगा। डीएम-एसपी निश्चित समय पर कार्यालय में बैठकर जनता की शिकायतें व समस्याएं सुनेंगे। मंत्रियों व विधायकों से बात करूंगा कि कार्यकर्ताओं की उपेक्षा न हो। प्रदेश में नौजवान मुख्यमंत्री है। पिछले पांच साल नौजवानों ने ही बसपा सरकार के कुशासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी। मैं कार्यकर्ताओं के बीच रहूंगा। कार्यकर्ता जनता के बीच जाएं और उनके दुखदर्द में शरीक हों। मंत्री विधायक और अन्य नेता अपना आचरण मर्यादित रखें।’ उत्तर प्रदेश में सपा सरकार बनने के बाद मुलायम कई बार कार्यकर्ताओं के बीच इसी तरह की बातें बोल चुके हैं।
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वर्ष 1989 का नजारा याद आता है। लोगों की जुबान पर यह गीत रट सा गया था, ‘नाम मुलायम सिंह है लेकिन काम बड़ा फौलादी है।’ तब से अब तक उन्होंने कई बार यह साबित भी किया कि वह वास्तव में फौलादी काम करने वाले नेता हैं। किसी की न सुनने वाले सिर्फ अपने मन की करने वाले। ऐसे नेता के यह वाक्य अपने आप में बहुत कुछ कह देते हैं। संकेत मिलता है कि मुलायम कुछ खौफजदा सा हैं। वह भी किसी दूसरे से नहीं बल्कि अपने ही पुत्र की सरकार से। वह सरकार के कामकाज को लेकर आशंकित है। उन्हें यह डर भी सता रहा है कि कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और सरकार से दूरी जनता में कही गलत संदेश न दे दे और लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कम से कम 60 सीटें जीतने के सपने पर पानी फिर जाए।

अनुभवहीनता का डर
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो मुलायम ने बहुत बड़ा सियासी जुआ खेला है। इसके पीछे उनके भीतर कहीं न कहीं विरासत की सुरक्षा की चिंता की झलक ही दिख रही है। वह जानते हैं कि लोकसभा चुनाव में किसी चूक या किन्हीं वजहों से ज्यादा सीटें नहीं मिली या दूसरे दलों खासतौर से बसपा के आसपास ही रहीं तो इससे न सिर्फ उनका केंद्रीय राजनीति का सूत्रधार बनने का सपना टूट जाएगा, बल्कि सूबे में भी सपा की साख पर सवाल लग जाएगा। लोकसभा चुनाव के नतीजों को सरकार के कामकाज से जोड़कर विश्लेषण होगा। इससे अखिलेश को बड़ा और सफल नेता बनाने के अरमान पर पानी फिर सकता है। इसलिए वह कहीं पर कोई चूक नहीं रहने देना चाहते। यही वजह है कि वह बार-बार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि पुत्र होने के बावजूद उनकी प्राथमिकता जनता है। जिससे जनता में उनकी (मुलायम) साख बनी रहे और लोकसभा चुनाव में वह जनता का वोट सपा को दिला सकें।
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कार्यकर्ताओं का भरोसा डगमगाने का भय
मुलायम को पता है कि कार्यकर्ताओं में अपनी सरकार होने का भाव ही लोकसभा चुनाव में सपा की जीत का रास्ता तैयार करेगा। इसीलिए वह बार-बार कार्यकर्ताओं के बीच यह कहते हैं कि वह उनके बीच ही रहेंगे। सरकार के कामकाज पर निगाह रखेंगे। सरकार कहीं गड़बड़ी करेगी तो उसे ठीक कराएंगे। मंत्रियों व विधायकों को कार्यकर्ताओं की बात सुननी होगी।

जनता में गलत संदेश जाने की आशंका
मुलायम को अनुभव है कि सत्तारूढ़ दल का नेता होने का नशा किसी भी पार्टी को जनता से दूर कर देता है। इसीलिए सरकार बनने के बाद मुलायम लगातार अपने मंत्रियों, विधायकों, सांसदों व पार्टी के कार्यकर्ताओं को मर्यादा व आचरण दुरुस्त रखने की नसीहत दे रहे हैं। चाहे हर्ष फायरिंग का मामला हो या अधिकारियों के साथ अभद्रता का अथवा जनता के बीच छवि का।

पढ़ा चुके हैं पाठ
मुलायम सिंह यादव 31 जुलाई को विधायकों व मंत्रियों को जनता और कार्यकर्ताओं के सम्मान का पाठ पढ़ा चुके हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मौजूदगी में वह मंत्रियों को न सुधरने पर लालबत्ती छिनने तक की चेतावनी दे चुके हैं। साथ ही यह भी कह चुके हैं कि जनता से घुले-मिलें, जिससे लोकसभा चुनाव में नतीजे बेहतर रहें।

मुलायम को खौफ सता रहा है कि अखिलेश की अनुभवहीनता लोकसभा चुनाव में पार्टी के लिए समस्या न बन जाए। वह नौकरशाही की चाल व चरित्र को भी जानते हैं। उन्हें पता है कि नौकरशाही आसनी से सरकार को जनता के नजदीक नहीं जाने देती। इसलिए यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वह जनता के बीच रहकर सरकार पर नजर रखेंगे। डॉ. राममनोहर लोहिया कहते थे कि सरकार को 100 दिन के भीतर कोई न कोई उल्लेखनीय फैसला करना चाहिए, जिससे जनता में सत्ता के बदलाव का संदेश जाए। सरकार ने भले ही कालिदास मार्ग खोल दिया हो, धरनास्थल फिर पुरानी जगह आ गया हो लेकिन सौ दिन के भीतर कोई ऐसा फैसला यह सरकार नहीं कर पाई है जिसे बहुत उल्लेखनीय कहा जा सकता हो। इस वजह से भी मुलायम को बार-बार सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का संदेश देना पड़ रहा है, जिससे जनता के मन में सपा का आकर्षण बना रहे।
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-के. विक्रमराव, वरिष्ठ पत्रकार
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