गुरुवार को सरदार पटेल की विशालकाय प्रतिमा के शिलान्यास के मौके पर नरेंद्र मोदी का भाषण कई बार यह इशारा कर गया कि वह पटेल की विरासत संभालना चाहते हैं।
उन्होंने पटेल की खूबियां गिनाईं, तो उन्हें 'नजरअंदाज' करने के लिए कांग्रेस को खरी-खोटी भी सुनाई। लेकिन यह सवाल जहन में आना स्वाभाविक है कि इस प्रतिमा के बहाने मोदी कहां तक पहुंचना जाते हैं? और अचानक सरदार की विरासत इतनी अहम क्यों हो गई, जिस पर न अब तक भाजपा का ध्यान था और न कांग्रेस का।
जानकार कहते हैं कि राजनीति में कुछ भी बेवजह नहीं होता। अगर मोदी इन दिनों सरदार पटेल पर निगाह टिकाए हैं, तो वजह जरूर होगी। ईटी के मुताबिक इसकी ये वजह हो सकती हैं।
सियासत के सेंटर की राह
पटेल की विरासत को साझा करने से नरेंद्र मोदी को सियासत के मध्य तक पहुंचने की राह मिल सकती है, जो देश की सियासत में वामपंथ और दक्षिणपंथ, दोनों से बेहतर हालत में दिखती है। पटेल, 'नेहरू वाली धर्मनिरपेक्षता' के कायल नहीं थे और उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय को दी जाने वाली तरजीह का हमेशा विरोध किया।
एकता के जरिए जुड़ने की कोशिश
मोदी ने सभी गांवों से इस प्रोजेक्ट के लिए लोहा देने की अपील की है। यह कुछ-कुछ रामजन्मभूमि आंदोलन से मिलती-जुलती कोशिश है, जब आडवाणी ने ईंट मांगी थीं। लेकिन फर्क यह है कि उस आंदोलन में विभाजन दिखता था, इस योजना में एकता का भाव देने की कोशिश है। ऐसा कर मोदी 'मध्यमार्गीय राजनीति' में यकीन रखने वाले लोगों तक पहुंचना चाहते हैं।
राहुल पर प्रहार की तैयारी
नरेंद्र मोदी चुनावी जंग में नेहरू के प्रपौत्र से भिड़ रहे हैं, ऐसे में उनके लिए राहुल को नेहरू का उत्तराधिकारी बनाने का फायदा मिल सकता है और वह खुद को पटेल के उत्तराधिकारी के रूप में दिखाना चाहते हैं। अगर पटेल देश के पहले पीएम होते है, तो देश की तकदीर-तस्वीर कुछ और होती, मोदी का यह बयान इसी कोशिश को रेखांकित करता है।
नेहरू पर सवालिया निशान
पटेल के साथ खुद को जोड़कर मोदी को फायदा मिल सकता है, क्योंकि उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा को लेकर कड़े फैसले लेने वाले नेता के रूप में देखा जाता रहा। पटेल ने रियासतों को जोड़कर देश मिलाया, जबकि कश्मीर मुद्दा संभालने के नेहरू के तरीकों पर भाजपा हमला बोलती रहती है।
आर्थिक सिद्धांतों की रणनीति
इस कदम से मोदी को अपने आर्थिक फलसफे को नेहरू के समाजवाद और इंदिरा गांधी के उद्योगों के राष्ट्रीयकरण से जुड़ी रणनीति के सामने रखने का मौका मिलेगा।
छोटा सरदार?
पटेल की ब्रांड वैल्यू में जमीनी हकीकत की बात, निर्णायक क्षमता, मजबूत और पुख्ता रुख शामिल है। ये तमाम चीजें मोदी की छवि से मेल खाती दिखती हैं। साथ ही नेहरू के ठीक खिलाफ हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वह विदेश में पढ़े-लिखे, रईस थे। कांग्रेस, पटेल की तारीफ को लेकर मोदी को लपेट सकती है, लेकिन नेहरू-गांधी के नाम पर चलने वाली पार्टी में किसी तीसरे नेता की खास जगह नहीं, यह बात जगजाहिर है।