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स्टूडियो में शालीनता, रैलियों में गालियां!

Mon, 24 Feb 2014 09:02 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
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यह अरविंद केजरीवाल का स्टाइल है। वक्त और माहौल देखकर बयान में इस्तेमाल होने वाले लफ्ज, लहजा और इनके अलावा भी बहुत कुछ बदल जाता है। आईआईटी के बाद आईआरएस और फिर आंदोलन के बाद राजनीति, केजरीवाल ने कई दौर देखे हैं।
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और जाहिर है, इन तमाम दौर से गुजरते हुए वो कई बार खुद भी बदल गए। इन दिनों वो मंझे हुए नेताओं की तरह बात करना चाहते हैं, लेकिन अलग भी दिखना चाहते हैं। हालांकि, ऐसा करते वक्त कई बार वह बाकी नेताओं जैसा बनने में भी कोई गुरेज नहीं दिखाते। वो अपने अलावा सभी को भ्रष्टाचारी बताते हैं, दावे करते हैं और वादों की झड़ी भी लगाते हैं।

लेकिन एक चीज और है, जो उनके बयानों में इन दिनों खास तौर पर नजर आ रही है और नोट भी की जा रही है। केजरीवाल जब टीवी स्टूडियो में बैठते हैं या मीडिया से बात करते हैं, तो शालीन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन चुनावी रैली और धरने के वक्त उनकी शब्दावली पूरी तरह बदल जाती है।
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रैलियों में तू-तड़ाक क्यों?

बोलने के लहजे में यह बदलाव एक नहीं, बल्कि अब कई बार इस्तेमाल किया जा चुका है और दर्ज भी किया जा चुका है। आदमी पार्टी जब दिल्ली की सत्ता में थी और अरविंद केजरीवाल सीएम पद संभाल रहे थे, तो उनकी भाषा पूरी तरह अलग रही।

लेकिन बतौर सीएम भी उन्होंने अपनी भाषा के दो पहलुओं से अवगत कराया, जो एक-दूसरे से उलट थे। दिल्ली सचिवालय के अपने दफ्तर या कहीं और प्रेस कॉन्फ्रेंस करते वक्‍त वो संयत रहे, लेकिन जब बात धरने पर बैठने की जगह तय करने की आई, तो केजरीवाल तू-तड़ाक पर उतरते दिखे।

उनका कहना था, "शिंदे कौन होता है यह बताने वाला कि मैं कहां बैठूंगा। मैं दिल्ली का सीएम हूं और यह सिर्फ मैं तय करूंगा कि मुझे कहां बैठना है।" गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे से केजरीवाल की पुरानी तल्‍खी चली आ रही थी। इसके बाद वह रेल भवन के बाहर धरने पर बैठे, जिसे लेकर आम आदमी पार्टी को काफी आलोचना झेलनी पड़ी।

जंग पर बदले बयान और लहजा भी

आम आदमी पार्टी और अर‌विंद केजरीवाल का रुख दिल्ली के उप-राज्यपाल नजीब जंग को लेकर भी लगातार बदलता रहा। सरकार बनाने से पहले उन्होंने कई बार जंग की तारीफ की।

और जब जन लोकपाल बिल को पेश करने पर पसोपेश जारी थी, तो कई बार उन्होंने कहा, "उप-राज्यपाल साहब इस पर विचार कर रहे हैं, लेकिन मैं जानता हूं कि उन पर दबाव है।"

लेकिन सरकार से इस्तीफा देने के बाद केजरीवाल ने नजीब जंग को भी नहीं बख्‍शा। उन्होंने कहा कि उप-राज्यपाल कांग्रेस की एजेंट की तरह काम कर रहा है और हम चुनाव न कराने के मुद्दे पर अदालत में जाएंगे।

हुड्डा को बता दिया दलाल?

ऐसा लगता है कि अरविंद केजरीवाल के सामने जब रैली की भीड़ खड़ी होती है, तो उनकी भाषा शैली शालीनता छोड़कर तू-तड़ाक पर उतर आती है। रविवार को हरियाणा रैली में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला।

उन्होंने हरियाणा के मुख्यमंत्री भुपेंद्र सिंह हुड्डा पर हमला बोला। कहा कि हुड्डा मुख्यमंत्री नहीं प्रॉपर्टी डीलर हैं और जमीन का दलाल बन चुका है। उसने किसानों से जमीन छीनकर रॉबर्ट वॉड्रा को दे दी।

इसी रैली में उन्होंने रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी से लेकर भाजपा के पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी लपेटा। और ऐसा करते वक्‍त उन्होंने भाषा पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया।

अंबानी की जेब में राहुल और मोदी?

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि देश को सोनिया, राहुल या मनमोहन सिंह नहीं, बल्कि मुकेश अंबानी चला रहा है। उन्होंने कहा कि मोदी अगर प्रधानमंत्री बने तो भी देश को अंबानी ही चलाएगा। कुछ इसी तरह की बातें वह पहले भी कह चुके हैं।

यह बात और है कि मीडिया से बात करते वक्‍त वह अंबानीजी, मोदीजी और राहुलजी कहते हैं, लेकिन रैलियों में किसी तरह का सम्मान बख्‍शे जाने के मूड में नहीं दिखते। अंग्रेजों से अंबानी की तुलना करते हुए केजरीवाल बोले कि पहले देश पर इस्ट इंडिया कंपनी का राज था और अब उसकी जगह अंबानी आ गए हैं।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस-भाजपा एक हैं। उन्होंने गैस की कीमत को लेकर कांग्रेस-बीजेपी को चिट्ठी लिखी, लेकिन जवाब नहीं दिया। मोदी और राहुल पर हमला बोलते हुए केजरीवाल ने कहा कि दोनों मुकेश अंबानी के दिए हेलीकॉप्टर में घूमते हैं। अंबानी के एक जेब में राहुल हैं तो दूसरी में मोदी।
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केजरी का नौसिखियापन या रणनीति?

हुड्डा, मोदी, राहुल और अंबानी पर बरसने के बाद केजरीवाल ने जुबानी तोप का मुंह मीडिया की ओर मोड़ दिया और कहा कि मीडिया को भी ठीक करना है। फिर एक बार उन्होंने अंबानी का नाम लेते हुए कहा कि मीडिया को पैसा देकर वह केजरीवाल को बदनाम करवा रहा है।

हालांकि, जैसे ही इस बात को लेकर मीडिया सवाल करता है, तो आम आदमी पार्टी के दूसरे नेता सफाई में कहते हैं कि ऐसे शब्द इस्तेमाल नहीं करने चाहिए। इससे पहले पूर्व मंत्री और AAP नेता सोमनाथ भारती ने कहा था, "मैं अरुण जेटली जैसे नेताओं के मुंह पर थूकना भी नहीं चाहूंगा।"

इसके अलावा कुमार विश्वास जैसे नेता भी केजरीवाल की पार्टी से आते हैं, जो अपनी बोली को लेकर कई बार फंस चुके हैं और बाद में फंसने पर माफी मांग चुके हैं। सवाल यह है कि इस तरह की भाषा राजनीति में नौसिखियापन की वजह से है या फिर यह सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
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