फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कहां गुम हुए अखिलेश के सौतेले भाई और उनकी बीवी?

Wed, 26 Mar 2014 05:04 PM IST
वेद विलास उनियाल/अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन
सैफई महोत्सव में नेताजी राग-रागनियों का आऩंद लेते दिखे। मुलायम सिंह कह सकते हैं कि उनका घराना केवल राजनीति ही नहीं करता, वहां कला के लिए समर्पित लोग में भी है। उनकी एक बहू जानी-मानी डांसर हैं तो अखिलेश यादव के सौतेले छोटे भाई प्रतीक की पत्नी अपर्णा गीत गाती हैं।
विज्ञापन


भला उनके म्यूजिक एलबम को रिलीज करने के लिए सैफई महोत्सव से अच्छी जगह क्या होती। उनके जेठजी मुख्यमंत्री हैं तो फिर उनके ही हाथ से रिलीज होना ही था। जहां बालीवुड के बड़े-बड़े कलाकारों के विशेष शो थे, वहां अर्पणा का वह एलबम भी जारी हुआ, जिसमें उन्होंने अपने ससुर मुलायम सिंह की प्रशंसा में अपना स्वर दिया है।

लग यही रहा था कि चुनाव होंगे तो समाजवादी पार्टी उनकी इस कला का बखूबी इस्तेमाल करेगी। चारों ओर मुलायम की प्रशंसा वाला एलबम बजेगा। खास कर आजमगढ में, जहां प्रतीक को टिकट देने की बात थी। आजमगढ़ में प्रतीक नहीं नेताजी ही चुनाव लड़ रहे हैं और उस एलबम की आवाज भी नहीं सुनाई दे रही है।
विज्ञापन

केजरीवाल पर स्याही

बड़े कसीदे से तैयार किया गया क्रांतिकारी व्यक्तित्व फीका हो जाता है, अगर किसी ने स्याही नहीं फेंक दी। न जाने इस स्याही में कैसा सगुन है कि जिसके कपड़ों पर फेंकी जाती है, उसका चेहरा खिल जाता है। स्याही के पड़ते ही जो परस्पर बयान चलते हैं। एक तरफ कहा जाता है स्याही वाले कार्यकर्ता साथ चलते हैं। तो दूसरी ओर बताया जाता है कि जो हमारी उपस्थिति से डर रहे हैं वो हम पर स्याही फेंक रहे हैं।

स्याही किसने फेंकी और क्यों फेंकी इस पर न उलझें। बस स्याही के करिश्मे को देखे। बिल्कुल नाप तोल कर फेंकी जाती है। यानी अगर जलूस वाली गाड़ी में नेताजी के साथ आठ दस लोग खड़े हों तो सब पर थोड़े थोड़ पड़ जाते हैं। ऐसा नहीं होता कि केवल नेताजी पर ही एकदम स्याही उड़ेल दी जाए। स्याही सही अऩुपात बना कर फेंकी जाती है। अगर स्याही को चेहरे पर मलना होता है तो वह दोनों हाथ के बीच इतनी करीने से रखी जाती है। उसका भी अनुपात है कि कितनी स्याही चेहरे पर लगाई जाए। पर अजब यही है कि स्याही फेंकने का यह कैसा विरोध होता जिससे नेताजी को खुशी होती है। कुछ देर तो वह स्याही को पोंछते भी नहीं है। यूं ही रहने देते हैं। जो न देखना चाहे उसे भी दिखाते हैं कि देखिए हम पर स्याही फेंकी गई।

वाहनों में साथ चलते वाले भी अपने को भाग्यशाली समझते हैं कि नेताजी पर पड़ने वाले कुछ नीले छिंटे उन तक भी पहुंचे। संघर्ष त्याग की जब बात होगी तो उन्हें भी याद किया जाता रहेगा। इसलिए केवल बड़े नेताजी ही नहीं, साथ चलने वाले मुस्कराते हैं। जब तक स्याही फेंकने वाला न आए, उनकी नजरें यहां वहां कुछ टटोलती रहती हैं। कहां है भीड़ में स्याही वाला।

एक केजरीवाल फिल्म के पर्दे पर

एकदम केजरीवाल तो नहीं लेकिन उनकी भाव भंगिमा, जन आंदोलन करने के तरीके, और उनसे मिलता जुलता किरदार दीपक डोबरियाल निभाने जा रहे हैं। फिल्म का नाम है 'लालीपॉप सिंस 1947'। जाहिर है आजादी के बाद से लेकर आज तक राजनीतिक दल जिस तरह आम जनता को वादों का लालीपॉप देते आए हैं, इस फिल्म की कहानी कुछ उसी प्लाट पर तैयार की गई है।

फिल्म में थोड़ा परिवर्तन करने के लिए नायक दिल्ली का मुख्यमंत्री तो नहीं बनता लेकिन सांसद बन जाता है। फिर वह केजरीवाल के अंदाज में ही व्यवस्था से लड़ने बदलने की बात करने लगता है। इस फिल्म का निर्देशक राजनीतिक घराने से ही हैं। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री देवीलाल के पोते अनिरुद्ध चौटाला इसका निर्देशन कर रहे हैं।

माना जा रहा है कि दीपक डोबरियाल के अंदाज हाव भाव देखकर लोगों को उनके अरविंद केजरीवाल नजर आएंगे। फि्ल्म की पूरी कहानी नहीं बताई गई है। इसमें यह भी नहीं बताया कि आखिर नायक का संघर्ष कहां तक व्यवस्था को बदलता है। या नायक के सामने कैसी स्थितियां आती हैं।
विज्ञापन

अब नजर नहीं आते बिल्ले

चुनाव प्रचार के समय राजनीतिक पार्टियों के बिल्ले अब नजर नहीं आते। जमाना कांग्रेस के गाय बछिया वाले चुनाव चिह्न का रहा हो या जनसंघ के दीपक का या फिर जनता पार्टी हलधर किसान, टीन और प्लास्टिक के बिल्ले नजर आते थे। चुनाव के समय लोगों की शर्ट पर या कुर्ते पर ये बिल्ले नजर आते थे।

वक्त के साथ प्रचार के तौर तरीके बदलने पर राजनीतिक दलों के बैनर-पोस्टर का तो आज भी चलन है। लेकिन बिल्ले गायब हो गए। तब चुनाव प्रचार में टैक्सियों पर माइक लगाकर अपने प्रत्याशियों के बारे में बताया जाता था। बीच बीच में जोशीले नारे भी लगते थे। कार्यकर्ता बीच बीच में राजनीतिक दलों के बिल्लों को बांटा करते थे। इन बिल्लों में राजनीतिक दल के प्रमुख नेता की तस्वीर, चुनाव चिन्ह और चुनाव जिताने का कोई नारा लिखा होता था। इन बिल्लों से चुनावी प्रचार का अपना रंग जमता था।

चुनाव के एक दो हफ्ते बोरों में ऐसे बिल्ले आते थे। फिर यह लोगों को दिए जाते थे। कार्यकर्ता इन्हें पहनकर गौरव महसूस करते थे। बच्चों में भी इन बिल्लों के प्रति खासा क्रेज नजर आता था। इससे पता चल जाता था कि बच्चे ने जिस बिल्ले को पहना हुआ है, उसके परिवार में बड़े किस दल को वोट देने जा रहे हैं। मगर अब बिल्ले नहीं बंटते।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें