राजेश खन्ना से हारते-हारते बचे लाल कृष्ण आडवाणी 1991 में नई दिल्ली और गुजरात के गांधीनगर, दो जगह से चुनाव लड़े और जीते भी। नई दिल्ली में उन्हें इतना बड़े झटके की उम्मीद राजनीति के नौसिखिए फिल्मी सितारे राजेश खन्ना के हाथों से नहीं थी। अपनी इस बेहद कमजोर जीत से आहत आडवाणी ने नई दिल्ली सीट छोड़ दी और इसके कुछ महीनों बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने फिर राजेश खन्ना को मैदान में उतारा।
जवाब में भाजपा ने कांटे से कांटा निकालने की नीति अपनाते हुए फिल्मी दुनिया के दूसरे मशहूर कलाकार शत्रुघ्न सिन्हा को खड़ा किया। दो फिल्मी सितारों का देश में यह पहला चुनावी मुकाबला था, वरना तब तक बॉलीवुड की यह मर्यादा थी कि फिल्मी कलाकार न एक दूसरे के खिलाफ चुनाव प्रचार करते थे और न ही चुनाव लड़ते थे।
राजेश खन्ना के मुकाबले शत्रुघ्न सिन्हा के मैदान में आने से नई दिल्ली लोकसभा सीट का उपचुनाव बेहद दिलचस्प हो गया। पूरे देश की निगाह इस पर टिक गईं। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आम चुनाव में खन्ना के हाथों आडवाणी को मिले कड़े मुकाबले का बदला लेना चाहता था, इसलिए शत्रुघ्न के चुनाव की कमान भाजपा के दिल्ली दिग्गज मदनलाल खुराना को सौंपी गई।
दिग्गजों ने लगाई पूरी ताकत
कांग्रेस ने राजेश खन्ना के चुनाव की कमान फिर उन आर.के. धवन को सौंपी, जो खुद नई दिल्ली सीट से टिकट के दावेदार थे। भाजपा के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और दिल्ली के भाजपा दिग्गज मदनलाल खुराना, विजय कुमार मल्होत्रा, केदारनाथ साहनी, ओम प्रकाश कोहली आदि पूरी तरह सिन्हा की जीत के लिए जुट गए।
भाजपा को अपने पंजाबी और वैश्य जनाधार पर पूरा भरोसा था, इसलिए ज्यादा जोर यमुना किनारे बसी बड़ी झुग्गी बस्तियों पर दिया गया। जहां बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी मजदूर रहते थे। बिहारी बाबू बनकर शत्रुघ्न सिन्हा ने पुरबियों के बीच भोजपुरी बोलते हुए चुनाव प्रचार किया, तो अपने खान दोस्त की छवि को भुनाने के लिए सिन्हा हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर चादर चढ़ाने के बाद निजामुद्दीन, जंगपुरा के मुस्लिम बहुल इलाके में भी सिर पर टोपी रखकर घूमे।
वाजपेयी, आडवाणी और जोशी की जनसभाओं से नई दिल्ली चुनाव क्षेत्र अच्छादित हो गया। उधर कांग्रेसी भीतरघाती फिर राजेश खन्ना को हराने की तरकीब भिड़ाने लगे। इस बार राजेश खन्ना ने यह बात कांग्रेस अध्यक्ष और तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव तक पहुंचाई। राव ने पार्टी के वरिष्ठ नेता और अपने विश्वस्त विद्याचरण शुक्ल को पूरे चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी दी। शुक्ल के आने के बाद भीतरघाती कांग्रेसी दुबक कर रह गए। दोनों ओर से जबर्दस्त चुनाव प्रचार हुआ।
और जीत परदे पर नेता बने अभिनेता की हुई
राजेश खन्ना का परिवार फिर उनके साथ आ खड़ा हुआ। डिंपल कपाडिय़ा ने गलियों और मोहल्लों का दौरा किया। खन्ना के दोनों चुनावों में उनके मीडिया प्रभारी रहे उपेंद्र सूद के मुताबिक नई दिल्ली से राजेश खन्ना को पहली बार उम्मीदवार बनाने का फैसला खुद राजीव गांधी ने किया था, क्योंकि 1989 में यहां से कांग्रेस उम्मीदवार मोहिनी गिरी मात्र 19 हजार मतों से हारी थीं।
इसलिए राजीव ने खन्ना को मैदान में उतारा था कि वह आसानी से इस अंतर को पूरा कर सकेंगे और आडवाणी के खिलाफ जिस मजबूती से राजेश खन्ना लड़े, उससे उपचुनाव में फिर उन्हें ही टिकट दिया गया। आम तौर पर शानो-शौकत के शौकीन राजेश खन्ना ने न दिन देखा न रात। कई बार बिना दोपहर का खाना खाए सिर्फ नाश्ते पर ही पूरा दिन गुजार दिया। शायद ही कोई ऐसा इलाका रहा होगा जहां राजेश खन्ना पहुंचे न हों। जहां भाजपा का ज्यादा जोर बड़े नेताओं की जनसभाओं पर था,वहीं राजेश खन्ना ने घर-घर जाकर वोट मांगे।
मुकाबला कांटे का लग रहा था, लेकिन जब नतीजा आया तो फिल्मी पर्दे के नायक राजेश खन्ना ने खलनायक से अपना फिल्मी सफर शुरु करने वाले शत्रुघ्न सिन्हा को अस्सी हजार से भी ज्यादा वोटों से शिकस्त दी। यहां तक कि भाजपा के पंजाबी वोटों के गढ़ लाजपत नगर मतदाताओं ने भी राजेश 0खन्ना के हक में वोट डाले। इसके बाद काका (राजेश खन्ना) जो पर्दे पर कई बार नेता की भूमिका अदा कर चुके थे, पहली बार असली जिंदगी में नेता बने और संसद भवन पहुंचे।