22 अक्टूबर, 1962 के दिन को वह कभी भी नहीं भूल सकते हैं। आज भी दिल में एक टीस सी उठती है, काश हम तेजपुर बॉर्डर पर जाकर फायरिंग करते हुए बेशक शहीद हो जाते। लेकिन ऐसा मौका हमें पाकिस्तानी जासूस ने नहीं मिलने दिया। जासूस ने भारतीय सेना के अधिकारी की वेशभूषा धारण करके सैनिकों को तेजपुर बॉर्डर से पीछे हटने का आदेश दिया। सैनिकों ने उसके आदेश की पालना करते हुए बॉर्डर को छोड़ दिया। इसी कारण झज्जर जिले के गांव सांखोल के ब्रिगेडियर होश्यार सिंह शहीद हुए। चीन के साथ युद्ध परिणाम कुछ भी क्यों न रहे होते, लेकिन शहीद होने का मौका उन्हें नहीं मिल पाया। इसका मलाल तब भी था और आज भी यह बात रह रहकर दिल को सालता है। यह कहना है गांव जुलानी में रह रहे ऑर्डनरी कैप्टन हवा सिंह का।
चीन ने धोखा दिया
हवा सिंह ने बताया कि अक्टूबर, 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया था। भारत सरकार को इस बात का एहसास नहीं था कि चीन आक्रमण कर देगा। क्योंकि हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा भारत सरकार की तरफ से दिया गया था, लेकिन चीन ने धोखा दिया। चीनी सेनाओं ने पूरी तैयारी से हमला किया था। भारत की तैयारी बिल्कुल भी नहीं थी और आधुनिक हथियार भी नहीं थे। आक्रमण से पहले भारत की सेना की एक टुकड़ी कांगो, दक्षिण अफ्रीका गई हुई थी। भारत पर हमला होने के बाद कांगो से टुकड़ी को बुला लिया गया था। मैं भी उसी टुकड़ी में शामिल था।
'और कितने दिन यह युद्ध चलेगा'
50 वर्ष पीछे के उन दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वो तसवीर सामने आती है जब चीन के साथ अचानक युद्ध से भारतीय सेना जूझ रही थी। कोई लद्दाख में तैनात था तो कोई पूर्वी भारत के तवांग में। जब रात के अंधेरे में बत्तियां बुझाने का आदेश होता था तो मन में यही बात उठती थी कि और कितने दिन यह युद्ध चलेगा और हम कितना और खोएंगे। आजादी की उमंग थी और जवानों का मनोबल आसमान छू रहा था पर भारतीय सेनाओं के पास चीन के मुकाबले के लिए उतने आधुनिक हथियार नहीं थे। भारतीय सैनिक थ्री नोट थ्री से चीनी सेना का मुकाबला कर रहे थे।
पकड़ा गया पाक जासूस
हवा सिंह ने बताया कि 22 अक्टूबर को उन्हें हेलीकॉप्टर से फूटेल पहाड़ी पर उतारा गया। इससे पूर्व मशीनगन को पहाड़ी पर उतारा जाता चीनी सैनिक नजदीक पहुंच चुके थे। भारतीय सैनिक पीछे लौट रहे थे और सामने से अंधाधुंध फायरिंग हो रही थी। हेलीकॉप्टर को कोई नुकसान न पहुंचे, इसलिए उन्हें वापस तेजपुर हवाई पट्टी पर बुला लिया गया और निगरानी सौंप दी गई। इसी दौरान मिल्ट्री इंटेलीजेंटस ने भारतीय सेना की वर्दी में एक मेजर को पकड़ा, जो भारतीय मोर्चों पर सैनिकों में दहशत फैला रहा था। पूछताछ में खुलासा हुआ कि पकड़ा गया मेजर पाकिस्तानी था और भारतीय सैनिकों का मनोबल गिरा रहा था।
हमारे सैनिकों के पास सर्दी से बचने के लिए गर्म कपड़े, दस्ताने और गर्म जूते तक नहीं थे। कई सैनिक तूफानी बर्फीले ग्लेशियर में फंस गए तो कुछ को चीनी सेना ने बंदी बना लिया। उन्होंने बताया कि उस समय हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा दिया जा रहा था। लेकिन हम पड़ोसी को समझ नहीं पाए। अब हालात बदल गए हैं। भारतीय सेना की गिनती बेहतरीन सेनाओं में होती है। यहां के जवानों के जज्बे का कोई मुकाबला नहीं है।