मंडल और कमंडल की आंधी के दौर में हुए 1991 के लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा दिलचस्प चुनाव नई दिल्ली सीट पर हुआ, जब भारतीय जनता पार्टी के शिखर पुरुष और अयोध्या आंदोलन के नायक लाल कृष्ण आडवाणी, हिंदी सिनेमा के सितारे राजेश खन्ना से चुनाव हारते हारते बचे।
आडवाणी यह चुनाव महज डेढ़ हजार मतों से जीत सके, वह भी दोबारा मतगणना के बाद। आरोप यह भी है कि राजेश खन्ना को टिकट मिलने से नाराज कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इस चुनाव में आडवाणी की गुपचुप मदद भी की थी।
आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा को बिहार में रोके जाने और आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया और जनता दल तोड़कर चंद्रशेखर ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई।
अभिनेता पड़ा नेता पर भारी
सरकार बनने के चार महीने बाद ही राजीव गांधी के घर पर जासूसी कराने के आरोप को लेकर कांग्रेस से विवाद के बाद चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और देश में मध्यावधि चुनाव घोषित हो गए। रामरथ पर सवार लालकृष्ण आडवाणी उन दिनों भाजपा ही नहीं पूरे संघ परिवार के महानायक थे। देश भर में आडवाणी भाजपा के तारणहार थे। अटल बिहारी वाजपेयी से ज्यादा उनकी मांग चुनावी प्रचार के लिए थी।
ऐसे में कांग्रेस ने आडवाणी के खिलाफ नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र से राजेश खन्ना को मैदान में उतारा। इरादा था कि खन्ना की सिने लोकप्रियता को भुना कर आडवाणी को ज्यादा से ज्यादा चुनाव क्षेत्र में फंसा दिया जाए। कांग्रेसी रणनीतिकारों को भी यह अंदाजा नहीं था कि खन्ना मुकाबले को इस कदर कांटे का बना देंगे की हिंदुत्व के इस महानायक की नाव ही चुनावी वैतरणी में फंस जाएगी।
शुरुआत में सभी ने इस चुनाव को औपचारिक और खन्ना की उम्मीदवारी को प्रतीकात्मक ही माना। अति आत्मविश्वास से भरे आडवाणी देश भर में चुनाव प्रचार के लिए घूमते रहे। उधर राजेश खन्ना नई दिल्ली के गली मुहल्लों में घर-घर जाकर अपने लिए वोट मांगने लगे। पारिवारिक तनाव के बावजूद खन्ना के लिए चुनाव प्रचार के लिए उनकी पत्नी डिंपल कपाडिया और दोनों बेटियां भी आईं।
कांग्रेसियों ने ही डुबोई खन्ना की लुटिया
धीरे-धीरे नई दिल्ली की सड़कों और गलियों में राजेश खन्ना का जादू छाने लगा। तब जाकर आडवाणी के चुनाव प्रबंधकों को समझ में आया कि बाजी हाथ से निकल भी सकती है। आडवाणी को संदेश दिया गया और वह अपने चुनाव प्रचार के लिए नई दिल्ली आकर जम गए। आखिरी चार पांच दिन आडवाणी ने घूम-घूम कर जन संपर्क किया।
अयोध्या में राम मंदिर और हिंदुत्व के ज्वार के बावजूद राजेश खन्ना के लिए लोगों की, खासकर युवाओं की दीवानगी कम नहीं हुई। तब कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं का माथा ठनका कि अगर राजेश खन्ना ने आडवाणी को हरा दिया तो पार्टी में उनका कद कई नेताओं से बड़ा हो जाएगा। इसके बाद कांग्रेस में भीतरघात का षडय़ंत्र शुरु हुआ।
खन्ना के चुनाव में लगे हुए कुछ नेता इस खेल में शामिल हो गए। रातोरात मतदाताओं का मन बदलने के लिए सारे परंपरागत चुनावी हथकंडे अपनाए गए। इन साजिशों से अनजान राजेश खन्ना अपने जनसंपर्क में जुटे रहे। मतदान हुआ। भाजपा रणनीतिकारों और कांग्रेस के भीतरघातियों को अहसास हो गया कि आडवाणी चुनाव हार भी सकते हैं। जमाना उन दिनों मतपत्रों का था। इवीएम मशीनों का होता तो शायद यह मुमिकन भी हो जाता।
...और राजेश खन्ना विजयी होते-होते रह गए
मतगणना के दिन दोनों पक्ष अपनी अपनी तैयारियों के साथ डटे थे। मतगणना शुरु हुई। लगातार कांटे की टक्कर चलती रही। फिर राजेश खन्ना को बढ़त मिली जो आगे तक जारी रही। हालांकि अंतर कम था लेकिन आडवाणी का पीछे रहना बहुत बड़ी खबर थी। टीवी चैनलों का जमाना नहीं था, लेकिन अखबारों और एजेंसी के पत्रकारों का हुजूम नई दिल्ली के मतगणना केंद्र पर जमा हो गया।
आखिरी दौर की गणना में भी आडवाणी पिछड़े, तो अति उत्साही राजेश खन्ना और उनके समर्थक जीत की खुशी में झूमने लगे। आधिकारिक नतीजा आने से पहले ही खन्ना की जीत का जश्न मनने लगा। कांग्रेस के भीतरघाती नेताओं ने खन्ना को गुमराह किया। वह आखिरी दौर की मतगणना दोबारा कराएं, इससे उनकी बढ़त बढ़ जाएगी।
राजनीति की साजिशों से अनजान खन्ना ने यह मांग कर दी। यह मांग मान ली गई। दोबारा मतगणना में करीब दो हजार मतों से लाल कृष्ण आडवाणी चुनाव जीत गए। आडवाणी की जीत तो हुई लेकिन इस कमजोर जीत ने भाजपा का उत्साह ठंडा कर दिया।