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चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस का क्या होगा?

Wed, 14 May 2014 02:18 PM IST
अजित साही/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी के लिए
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भारत के सोलहवें लोकसभा चुनाव में मतदान 12 मई को ख़त्म हो गया। महीने भर के अंतराल में मतदान के नौ दौर हुए। लोकसभा की 543 सीटों पर होने वाले इस चुनाव के नतीजे 16 मई को आ जाएंगे।
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हर दौर में वोट के बाद मतदाताओं का सर्वेक्षण करने वाले तमाम 'एग्ज़िट पोल' बता रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी के सत्ताधारी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की करारी हार होने जा रही है। अधिकांश का कहना है कांग्रेस स्वयं सौ सीटें भी नहीं जीत पाएगी।

भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी कांग्रेस के बारे में ये दावा पहले से करते रहे हैं। एग्ज़िट पोल उनके इस दावे पर भी मुहर लगा रहे हैं कि भाजपा अपने जीवन की सर्वाधिक सीटें जीतकर सत्तारूढ़ होगी।
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अगर वाक़ई ऐसा होता है तो आज़ाद भारत के इतिहास में कांग्रेस की ये सबसे बुरी हार होगी। बासठ साल में पहली बार होगा कि लोकसभा में कांग्रेस की सीटों की संख्या तीन अंकों तक नहीं पहुंच पाएगी।

क्या होगा कांग्रेस का?

सत्ता में रहते हुए कांग्रेस तीन बार चुनाव हारी है, 1977, 1989 और 1996 में। पहली दो बार वो अगले ही चुनाव में जीतकर सत्ता में वापस आ गई थी। लेकिन 1996 के बाद 1998 और 1999 के अगले आम चुनाव में भी कांग्रेस की हार हुई थी।

इन तीनों चुनाव में कांग्रेस लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी भी नहीं बन पाई थी। ऐसा पहले सिर्फ़ 1977 में हुआ था। 1989 में बहुमत खोकर विपक्ष में आ जाने के बावजूद कांग्रेस लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी रही थी।

वर्ष 1996, 1998 और 1999 के चुनाव में सबसे ज़्यादा सीटें भाजपा को मिली थीं जिसके चलते उसने पहली बार केंद्र में सरकार बनाई थी। हालांकि बहुमत न जुटा पाने की वजह से 1996 की भाजपा की पहली सरकार तेरह दिन में गिर गई थी।

भ्रष्टाचार और घोटालों से गई कांग्रेस की साख

वर्ष 1998 में जीत के बाद भाजपा की अगुवाई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार तेरह महीने चली थी। 1999 वाली एनडीए सरकार पांच साल पूरे कर लेती। लेकिन जब भाजपा को दिसंबर 2003 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में ज़बरदस्त जीत मिली तो एनडीए ने आमचुनाव में जीत की अपेक्षा में समय से छह महीने पहले ही आम चुनाव करवा दिए।

एनडीए की इसी सरकार की जब 2004 में अप्रत्याशित हार हुई तो उसकी जगह कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए सरकार ने ले ली थी। अपेक्षा के प्रतिकूल यूपीए ने 2009 का चुनाव भी जीता जिसके चलते अब उसको सत्ता में दस साल हो गए है।

माना जा रहा है कि भ्रष्टाचार, घोटालों और ढलती अर्थव्यवस्था के चलते कांग्रेस की लगातार तीसरी जीत के कोई आसार नहीं हैं। यदि सचमुच कांग्रेस हारती है तो उसका भविष्य क्या होगा? क्या जैसा कि मोदी कह रहे हैं कांग्रेस का विघटन हो जाएगा और उस पर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी उपाध्यक्ष व उनके पुत्र राहुल गांधी का वर्चस्व समाप्त हो जाएगा?

क्या गांधी परिवार की प्रभुसत्ता कायम रहेगी?

यदि कांग्रेस हारती है तो ऐतिहासिक और तात्कालिक, दोनों ही दृष्टिकोण से कांग्रेस के सर्वनाश की संभावना कम दिखती है। इस अटकल में भी दम नहीं दिखता है कि पार्टी पर गांधी परिवार की प्रभुसत्ता ख़त्म हो जाएगी।

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस-जन गांधी परिवार के प्रति विशेष प्रेम रखते हैं। सोनिया-राहुल की शीर्षस्थता इसलिए अनिवार्य हो गई है क्योंकि पार्टी में ऐसा कोई नेता है ही नहीं जो उन्हें अपदस्थ करके उसकी कमान अपने हाथ ले सके।

इतिहास गवाह है कि जब भी किसी क़द्दावर कांग्रेसी नेता ने गांधी परिवार या हाईकमान का विरोध करके अपनी पार्टी बनाई है तो या तो उसका राजनीतिक जीवन समाप्त हो गया है या उसे उलटे मुँह लौट के कांग्रेस आना पड़ा है।

राहुल गांधी और सोनिया गांधी निर्विवाद रूप से कांग्रेस हाई कमान हैं।

कांग्रेसी भगोड़े भी हैं हार का कारण

महाराष्ट्र के शरद पवार ज़रूर एक अपवाद हैं। लेकिन 1999 में कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाने के बाद उनका भी क़द दोबारा कभी उतना ऊँचा नहीं हो पाया जितना तब था जब वह कांग्रेस में चोटी के नेता थे। और कांग्रेस से अलग होने के फ़ौरन बाद ही पवार को मजबूरन यूपीए से जुड़ना पड़ा था और वह आज भी उसी लाठी के सहारे दिल्ली में घूम रहे हैं।

कांग्रेस छोड़कर भी सफल राजनीति करने वाले रहे हैं लेकिन कम। ये अधिकतर वे हैं जो भाजपा या स्थापित क्षेत्रीय पार्टियों में शामिल हो गए थे। लेकिन इनमें भी कोई ऐसा नहीं है जो अगर आज कांग्रेस में होता तो गांधी परिवार को चुनौती दे पाता।

ऐसे कांग्रेसी भगोड़ों की संख्या अधिक नहीं है जिनको भाजपा में या दूसरे बड़े दलों में आसानी से जगह मिली हो। वजह ये है कि इन दलों में पहले ही कई महत्वाकांक्षी नेता हैं जो ज़ाहिर तौर पर दलबदलुओं को अपनी पार्टी में बमुश्किल घुसने देते हैं।

कांग्रेस मुक्त भारत?

कांग्रेस के असामयिक निधन की आशंका भी अतिरंजित है। हार के बावजूद उसकी राजनीतिक पैठ इसलिए बनी रहेगी क्योंकि भारतीय राजनीति के द्विकोणीय ध्रुवीकरण के एक कोण का प्रतिनिधित्व करने वाली वो अकेली राष्ट्र-व्यापी पार्टी है।

भारतीय लोकतंत्र को ब्रितानी संसदीय प्रणाली पर ज़रूर तराशा गया था, लेकिन 1951-52 के पहले आम चुनाव से लेकर 1989 के नौवें आम चुनाव तक भारत में ब्रिटेन सरीखी दो-दलीय व्यवस्था नहीं बन पाई थी।

यूँ तो अलग-अलग पार्टियाँ गाहे-ब-गाहे ठीक-ठाक चुनावी प्रदर्शन दिखा देती थीं। लेकिन कोई एक विशेष पार्टी कांग्रेस के स्थाई विकल्प के रूप में नहीं उभर पाई थी। 1977 में जीतने वाली जनता पार्टी भी ढाई साल के भीतर टूट कर बिखर गई थी।

1991 के आम चुनाव में 120 सीटें जीत कर भाजपा ने ऐसी दो-दलीय व्यवस्था क़ायम कर दी। 1991 को मिलाकर तबसे हुए छह चुनाव में भाजपा और कांग्रेस तीन-तीन बार क्रमश: पहले और दूसरे स्थान पर रही हैं। यानी एक दूसरे के आगे-पीछे।

भारतीय राजनीति में परिवर्तन युग

1991 में ही भारतीय राजनीति में एक और युगीय परिवर्तन आया था जब पहली बार एक वैकल्पिक विचारधारा का उदय हुआ था। दरअसल आज़ादी के बाद से लगभग हर राजनीतिक दल की प्रतिबद्धता मोटे तौर पर समाजवाद के प्रति ही रही थी। इसके अंतर्गत खाँटी पूँजीवाद को नकारकर राज्यसत्ता के लिए कल्याणकारी भूमिका और उत्तरदायित्व निश्चित कर दिए गए थे।

इसकी दो वजहें थीं। एक, महात्मा गांधी के विचार और दर्शन ने पहले से ही स्वतंत्र भारत के लिए दरिद्रता निवारण की प्राथमिकता तय कर दी थी। ग़रीब-बेसहारा के नाम पर हासिल आज़ादी मुक्त बाज़ार की व्यवस्था प्रधान नहीं हो सकती थी।

और दूसरी वजह ये कि अमेरिका के पाकिस्तान की ओर झुकाव के चलते भारत साम्यवादी सोवियत संघ का क़रीबी बन गया था जिस कारण राजनीतिक विचार पर समाजवादी और कल्याणकारी सोच और भी क़ाबिज़ हो गई थी।

मनमोहन का मनमोहक दांव

1980 के दशक में अमेरिका से भौगोलिक प्रतिस्पर्धा के चलते सोवियत संघ कमज़ोर होता गया और अंततः 1991 में उसका विघटन हो गया। इस क्रम ने एक झटके में अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को अकेला कर दिया।

इस घटना के चंद महीने पहले ही कांग्रेस भारत में दोबारा सत्ता में आई थी और उस वक़्त के प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव ने जाने-माने अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री नियुक्त किया था। मनमोहन सिंह ने आते ही ख़ाली ख़ज़ाने का हवाला देकर आनन-फ़ानन में दशकों से संरक्षित रही भारतीय अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खोलना शुरू कर दिया।

पश्चिमी यूरोप और अमेरिका की तर्ज़ पर मुक्त बाज़ार की इस विचारधारा में निजी व्यापार को बढ़ावा मिला और कल्याणकारी नीतियों और ख़र्च में कटौती शुरू हुई। उस वक़्त लगा समाजवादी कल्याणकारिता के दौर का हमेशा के लिए अंत हो गया।

लेकिन 1996 के चुनाव में कांग्रेस की तब तक की सबसे बुरी हार की वजह मुक्त बाज़ार की नई विचारधारा ही बताई गई। अगले दो चुनाव हारने के बाद कांग्रेस की नई नेता सोनिया गांधी राज्य सत्ता को कल्याणकारी उत्तरदायित्व तक लौटाने पर ज़ोर देने लगीं।

2004 में एनडीए की हार ने दिया कांग्रेस को हौसला

जब 2004 में एनडीए की मुक्त-बाज़ारी सरकार भी अप्रत्याशित रूप से हारी तो सोनिया का ये विश्वास दृढ़ हो गया।

2004 में प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह खुले बाज़ार और समाजवाद की मिश्रित विचार धारा लेकर आगे बढ़ने लगे। ग़रीबों को रोज़गार का संवैधानिक हक़ देकर काम दिलाने पर सरकारी कोष से हज़ारों करोड़ों रुपयों का ख़र्च आने लगा।

पाँच-वर्षीय कार्यकाल ख़त्म होते-होते यूपीए सरकार ने देश भर में किसानों पर हज़ारों करोड़ों का क़र्ज़ भी माफ़ कर दिया। जब यूपीए ने 2009 का आम चुनाव भी जीत लिया तो दोबारा प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह वस्तुत: कल्याणकारी नेता बन गए। और अब दो साल पहले राहुल गांधी के उदय से कांग्रेस की सार्वजनिक दावेदारी और भी समाजवादी हो गई है।
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मोदी के लिए चुनौती भरी होगी सरकार

पिछले कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में मुक्त बाज़ार और समाजवाद की इस मिली-जुली विचार धारा का द्वंद्व चल रहा है और आगे भी जारी रहेगा। पूँजीवादी व्यवस्था के दबाव में सरकारें खुले बाज़ार के नियम हावी करती हैं तो चुनाव जीतने की विवशता सरकारों को समाजवादी नारे और नीतियों की ओर खींचती है।

बाज़ार और समाजवाद का ये अंतर्विरोध भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय स्तर पर दो-दलीय व्यवस्था को पुख़्ता करता है। फ़िलहाल राजनीतिक क्षितिज पर भाजपा और कांग्रेस के अलावा कोई तीसरी पार्टी नहीं है जो इस ज़िम्मेदारी का निर्वाह कर सके।

भाजपा नेता मोदी यदि प्रधानमंत्री बनते हैं तो उन पर भी इन्हीं पारस्परिक विरोधी विचार धाराओं का दबाव रहेगा। जब यूपीए सरकार कल्याणकारी अधिक होने लगी तो मोदी पूँजीवाद और मुक्त बाजा़र की भाषा बोलने लगे।

बतौर प्रधानमंत्री मोदी को भी आने वाले वक़्त में कल्याणकारी होना पड़ेगा क्योंकि, जैसा कि भाजपा ने पहले देखा, बाज़ारी नीतियाँ चुनाव हराती हैं जिताती नहीं। ऐसे में कांग्रेस फटाफट द्विकोणीय ध्रुवीकरण के दूसरे कोण पर जाकर बैठ जाएगी।

जब तक समाजवाद और बाज़ार का द्वंद्व रहेगा भाजपा और कांग्रेस, दोनों कमोबेश एक-दूसरे के आगे पीछे रहेंगी।
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