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जानिए, आखिर क्या है काले ताजमहल की सच्चाई?

Wed, 16 Jul 2014 11:24 AM IST
अमित कुलश्रेष्ठ/अमर उजाला, आगरा
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किस्से कहानियों, अफसानों में काला ताजमहल बेशक तामीर हुआ हो, लेकिन हकीकत में इसके सबूत अब तक सामने नहीं आए हैं।
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ताजमहल के पीछे यमुना किनारे महताब बाग में 1996 में हुए उत्खनन और अब साइंटिफिक क्लीयरेंस के बाद महताब बाग को ताजमहल का ही ग्रांड डिजायन माना जा रहा है।

एएसआई और वर्ल्ड मान्यूमेंट फंड ने सफाई दी है कि काले ताज के लिए न तो खोदाई की गई है और न ही यह कभी अस्तित्व में था। महताब बाग ताज के चार बाग शैली के मुगल गार्डन की तरह का ही बागीचा रहा है। उसी को पुनर्जीवित करने का प्रयास चल रहा है।
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दीदार-ए-ताज के दौरान विदेशी सैलानियों को ताज के पीछे यमुनापार काले ताज और चांदी से ब्रिज के जरिए जोड़ने की कथाएं रोमांचित करती रही हैं।

इन्हीं दंत कथाओं, मिथक के बाद 21 साल पहले 1993 से 1996 तक महताब बाग का उत्खनन किया गया। यहां केवल बागीचे और फव्वारों की संरचना ही निकली। इन दिनों साइंटिफिक क्लीयरेंस में बारादरी की दीवार से मिट्टी हटाने का काम चल रहा है।

काले ताज का मिथक कैसे पनपा?

- ताज की मस्जिद की आर्च पर बनी दो ताज की पेंटिंग
- फ्रेंच यात्री टवर्नियर ने काले ताज को प्रचारित किया
- 1871 में कार्लाइल ने काले ताज का कई जगह जिक्र किया
- ताज में मुमताज के पास शाहजहां की कब्र समानता के सिद्धांत पर दाग
- ताज के मुख्य गुंबद को केवल मुमताज की कब्र के लिए बनाया गया
- 1910 के बाद गाइडों, स्थानीय लोगों ने काले ताज की दंतकथा बतानी शुरू की

महताब बाग की हकीकत में तर्क
- 1652 में बाढ़ के बाद औरंगजेब ने बाग की दशा पर रिपोर्ट दी
- शाहजहांकालीन किसी पुस्तक में काले ताजमहल का जिक्र नहीं
- 1996 के उत्खनन में अष्टभुजीय 25 फ व्वारों का तालाब मिला
- मुगलिया चार बाग शैली के मुताबिक बागीचे का निर्माण
- ताजमहल एवं महताब बाग की बुर्जी में आर्किटेक्चरल समानता नहीं
- अष्टभुजीय फव्वारे के नीचे बारादरी के अवशेष निकलने शुरू हुए

जब शाहजहां ने ताज पर लिखी कविता

इसका नजारा आंखों में नहीं समाता, कि हर एक बारी पर आंखें आफताब हो जाती हैं।
अगर तुझको ख्वाहिश है तो सर के बल आ, बगैर फैज के गुजरती नहीं है हवा।।

मुमताज की याद में बनवाए गए रोजे को देख शाहजहां ने फारसी में अपने जज्बातों को इन शब्दों के रूप में बयां किया।

पत्रकार एवं साहित्यकार डा. प्रणवीर चौहान के मुताबिक 1928 में मो. काले खां अकबराबादी की लिखी पुस्तक ‘हालात शाही इमारत आगरा’ में इन शेरों का फारसी और हिंदी में अनुवाद किया गया है।

डॉ. चौहान के मुताबिक काले ताजमहल की खोज में चल रही खुदाई में जिस तरह के अवशेष मिले हैं, उनका जिक्र इस पुस्तक में किया जा चुका है।
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मौजूद ही नहीं है इसके आर्किटेक्चरल सबूत

बुर्जी के साथ नींव और पूरी डिजायन का ब्योरा काले खां अकबराबादी ने किया था। वह स्वयं ताज पर अब तक लिखी गई विभिन्न भाषाओं की कविताओं का संकलन कर रहे हैं, जो जल्द किताब के रूप में लोगों के सामने होगी।

इस मुद्दे पर एएसआई के पूर्व निदेशक पीवीएस सेंगर ने कहा, "ऐतिहासिक दस्तावेजों, आर्कियोलॉजी और आर्किटेक्चर के लिहाज से काले ताज का अस्तित्व नहीं है, यह बात 1996 में मेरे द्वारा उत्खनन में साबित हो चुकी है। महताब बाग ताज का ही हिस्सा है और प्रमुख बागीचों में से एक है। साइंटिफिक क्लीयरेंस से काले ताज के मिथक झूठ साबित हुए है।"

एएसआई के एक और पूर्व निदेशक के के मोहम्मद के मुताबिक, "शाहजहां की कब्र पर असमानता, टवर्नियर के लेख से काले ताज पर शंका तो है, लेकिन सबूत नहीं हैं। महताब बाग के उत्खनन में कोई ठोस प्रमाण भी नहीं मिले हैं, जो इसे सच साबित कर सके।"
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